जबलपुर | ओ.बी.सी. प्रकरणों की 14 वे दिन सुनवाई थी, उक्त समस्त प्रकरणों की विशेष बैंच में जस्टिस आनंद पाठक तथा जस्टिस विनय सराफ सुनवाई कर रहे है | ओ.बी.सी. वर्ग की और से वरिस्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर द्वारा अपनी बहस में कोर्ट को महाजन आयोग की रिपोर्ट के अध्याय 4 एवं 5 जिसमे वरंग व्यवस्था तथा उसका पिछड़े वर्गों पर प्रभाव पर वहस करते हुए हिन्दू वर्गं व्यव्स्था के सन्दर्भ में अवगत करते हुए बताया गया की ओ.बी.सी. के समस्त जातिया शूद्र वर्ण में वर्णित की गई है , उन्होंने बताया की आयोग ने समस्त हिन्दू धर्म शास्त्रो के अध्यन के उपरांत प्रदेश में ओ.बी.सी. की 92 जातियो को सूचिवद्ध किया गया है | उक्त जातियों में से क्रीमीलेयर के आधार पर जिनकी वार्षिक आय 8 लाख रूपया है उनको ही एन.सी.एल. ( नान क्रीमीलेयर ) का प्रमाणपत्र दिया जाता है तथा नान क्र्मिलेयर के ही अभ्यर्थी ओ.बी.सी. आरक्षण का लाभ ले सकते है अर्थात ओ.बी.सी. में अगल से पहचान का या डेटा कलेक्ट करने का प्रश्न ही उतपन्न नही होता | ओ.बी.सी. की पहचान करने के लिए सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के परिपत्र के अनुसार, प्रदेश में प्रमाण पत्र जारी करने वाले प्राधिकारियों की जिम्मेदारी है न की किसी डेडीकेट कमीशन और न ही किसी ट्रिपल टेस्ट की बल्कि संवंधित प्राधिकारी को ही वो ओ.बी.सी. की पहचान करके जाति प्रमाण पत्र जारी करने की जिम्मेदारी है | कोर्ट को बताया की मध्य प्रदेश में ओ.बी.सी. की 51% का आकडा मौजूद है लेकिन वास्तव में ओ.बी.सी. की आवादी 60% से अधिक है आयोग ने अपनी रिपोर्ट में केवल ४५ जिलो के डाटा संग्रहित किए है जिसे 2011 की जनगणना में भी उल्लिखित किया गया है | कोर्ट को बताया की मध्य प्रदेश में की जाने वाली भर्तियो में हमेशा से 50% अनारक्षित पदों को परिक्षा के प्रथम तथा द्वितीय चरण में समान्य वर्ग को आरक्षित किए जाते रहे है, जिसका उदाहार्ण हाईकोर्ट द्वारा की जाने वाली भर्तियो के रिजल्ट प्रस्तुत करके बताया गया की ओ.बी.सी. के कटाफ अंक 85 से 88 है तथा सामान्य वर्ग के कटाफ अंक 75 से 78 है एवं सिविज जज चयन परीक्षा में साक्षात्कार अंको का भी हवाला दिया गया की आरक्षित वर्ग जिसके लिखित में अंक ज्यादा है उसे 50 में से 19.80 अंक देकर फेल कर दिया जाता है ताकी उक्त अभ्यर्थी जनरल की सीट पर चयनित न हो सके | और जब ये अभ्यर्थी कोर्ट में केस दाखिल करते है तो उक्त प्रक्रिया को जस्टिफाई भी कर दिया जाता है, इस लिए ओ.बी.सी. को आवादी के अनुपात में आरक्षण दिया जाना आवश्यक है | कोर्ट को बताया गया की मध्य प्रदेश में तात्काली कांग्रेस सरकार ने अगस्त 2019 में विधान सभा से 27% का कानून बनाया तथा अक्टूबर 2019 में तत्कालीन सरकार ने 555 पेज का जबाब दाखिल करके उक्त कानून को जस्टिफाई भी करने का प्रयास किया गया, लेकिन मार्च 2020 में सरकार का भंग होने से मौजूदा पार्टी की सरकारं ने उक्त आरक्षण के समर्थन में कोई प्रयास नही किया गया | जब भी हाईकोर्ट ने उक्त मामलो को डिसाइड करने सक्रिय हुई तो तीन दिनों के अन्दर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 83 ट्रांसफर याचिकाए लगाकर सभी मामले ट्रांसफर करा दिए | वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया की मई भी सुप्रीम कोर्ट में मामलो की सुनवाई के समय उपस्थित रहा हूँ , सुप्रीम कोर्ट ने तीन बार आफ रिकार्ड मध्य प्रदेश सरकार को सजिस्ट किया की छत्तीसगढ़ राज्य के आदेश के तहत आप भी अरक्ष्ण लागू कर दे लेकिन मध्य प्रदेश सरकार की ओर से हमेशा कहा गया की मामलो को अंतिम रूप से डिसाइड कराने के पक्ष में है | हाईकोर्ट को वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने बताया की मध्य प्रदेश सरकार एवं लोक सेवा आयोग ने कभी भी ओ.बी.सी. को 27% आरक्षण की मांग नही की है बल्कि इसी हाईकोर्ट में दो आवेदन दाखिल किए है जिनके क्रमांक 5654/2021 तथा 5601/2021 उक्त आवेदनों के माध्यम से सरकार ने ओ.बी.सी. को केवल 14% आरक्षण की मांग की है , तथा 13% आरक्षण को सरकार ने स्वंम 50% की सीमा से अधिक बताया गया है | सरकार के उक्त आवेदनों पर हाईकोर्ट ने दिनांक 13/07/ 2021 को विस्तृत आदेश पारित करके सरकार की मंशानुसार ओ.बी.सी. को 14% अरक्ष्ण के मान से नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया गया एवं हाईकोर्ट ने इसी आदेश में EWS कोटा के तहत समस्त भर्तियो को याचिका क्रमांक २०२९३/२०१९ के तहत प्राविधिक मान्य किया गया है | हाईकोर्ट को वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी बताया की समस्त विज्ञापन 27% आरक्षण के अनुसार जारी किए गए लेकिन महाधिवक्ता के अभिमत के चलते 13% ओ.बी.सी. तथा 13% सामान्य वर्ग के पदों को होल्ड किया गया है जिसमे 2019 से 2025 तक लोक सेवा आयोग की भर्तियो तथा प्रदेश के 37 विभागों की भर्तियो में लगभग ६०-65 हजार बच्चे प्रभावित है जिनमे से 50 से अधिक बच्चो ने तो आत्महत्या तक कर ली है कई लोगो के तलक तक हो चुके है इस सभी के जिम्मेदारी महाधिवक्ता एवं सरकार की है उन्होंने कोर्ट में फेयर तरीके से कहा की सरकार को 27% आरक्षण नही देना था तो 14% देती कम से कम 100% पदों पर भर्ती तो की जाती जिससे कई ओ.बी.सी. के अभ्यर्थी मेरिट क्रम में अनारक्षित में चयनित हो जाते फिर भी मध्य प्रदेश सरकार ने मामलो का हाईकोर्ट में लंबित होने का हाबाला देकर, न्यायपालिका तक को बदनाम करने की कसार तक नही छोड़ी | उन्होंने यहाँ तक कह दिया की सरकार को कई संगठनों ने अरक्ष्ण ख़त्म करने का अनुरोध किया है , सरकार चाहे तो एक नियम बनाकर की जिस भी छात्र ने कक्षा एक से बारह्बी तक सरकारी स्कूल में अध्यन किया है सरकार केवल उसी को ही सरकारी नौकरी का पात्र मानेगी | सरकार के उक्त फैसले का कोई भी विरोध नही करेगा | उन्होंने कोर्ट को बतया की प्रदेश के सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नही है जिनमे अधिकतर गरीबो के ही बच्चे पडते है यदि सरकार उक्त नियम बनाती है तो समाज के सभी वर्गों, अधिकारियों, नेताओ,मंत्रियो आदि के सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में दाखिला लेगे जिससे स्कूलों की स्थिति में सुधर होगा तथा शिक्षा में समानता आयेगी तब शायद आरक्षण की कोई जरूरत नही रहेगी | अंत में वरिस्थ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कोर्ट से अनुरोध किया की मौजूदा परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए ओ.बी.सी. के 27% अरक्ष्ण को अपहेल्ड किया जाए ताकी प्रदेश की 51% ओ.बी.सी. की आवादी के साथ न्याय हो सके |
ओ.बी.सी. वर्ग में रख रहे सभी अधिवक्ताओं की बहस समाप्त, आज आखिरी दिन होगी अंतिम सुनवाई
byEditor In Chief- मो.अशफाक आरिफ़
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