सात बरस बाद नई वक्फ कमेटी ने संभाली जिम्मेदारी; दुकानों के बकाये, गुमटियों की आमदनी और कथित कब्जों पर जवाबदेही की उम्मीद
जबलपुर | मंडी मदार टेकरी कब्रिस्तान में सात बरस बाद इंतज़ामिया कमेटी का चेहरा बदल गया है। नई वक्फ कमेटी की जिम्मेदारी मोहम्मद हामिद अंसारी को सौंपी गई है। वकार राजू उपाध्यक्ष, निजाम कुरैशी सचिव और पप्पू कूलर कोषाध्यक्ष बनाए गए हैं।
नई कमेटी के गठन के साथ कब्रिस्तान के बेहतर इंतज़ाम की उम्मीद तो पैदा हुई है, मगर इसके साथ ऐसे कई पुराने सवाल भी फिर सतह पर आ गए हैं जो लंबे अरसे से जवाब के मुंतज़िर हैं।
मामला केवल सफाई, रोशनी या देखरेख का नहीं है।
मामला उस अमानत का है जिसकी जमीन, दुकानें और आमदनी समाज की मानी जाती है।
पुरानी कमेटी का कार्यकाल वर्ष 2019 में खत्म हो चुका था। इसके बाद करीब सात साल तक कब्रिस्तान की मिल्कियत, किरायेदारी और आमदनी के इंतज़ाम को लेकर तरह-तरह की बातें होती रहीं।
अब जब नई कमेटी सामने आई है तो लोगों की निगाह इस बात पर है कि क्या सिर्फ नाम बदलेंगे या निज़ाम भी बदलेगा।
दुकानों का बकाया... अब खुलेगा पुराना खाता?
कब्रिस्तान के मुख्य दरवाजे से लगी दुकानों को लेकर काफी वक्त से चर्चाएं होती रही हैं।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक इन दुकानों से मोहम्मद कादिर, शौकत कुरैशी, मुन्ना मिठाई, शरीफ होटल, जफर और एक पार्षद परिवार से जुड़े लोगों के नाम सामने आते हैं।
जफर के इस्तेमाल में बताई जाने वाली एक दुकान अब खाली हो चुकी है। जानकारी है कि नई कमेटी वहां अपना दफ्तर कायम करने की तैयारी में है।
मगर कुछ दूसरी दुकानों को लेकर मामला पेचीदा बताया जा रहा है।
सूत्रों का कहना है कि कुछ दुकानों का किराया सात-आठ बरस तक बकाया हो सकता है। एक दुकान के बारे में तो करीब पच्चीस साल से किराया जमा न होने की चर्चा है।
बताया जाता है कि यह दुकान पहले अय्यूब शेरा को किराये पर दी गई थी, लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल दूसरे व्यक्ति द्वारा किया जाने लगा। स्थानीय जानकारी के अनुसार कुछ समय पहले तक यहां साइकिल पंचर बनाने का काम होता था और अब जगह को कार्यालय की शक्ल दे दी गई है।
अगर किरायेदारी बदली थी तो क्या इसकी मंजूरी ली गई?
क्या रिकॉर्ड में नए कब्जेदार या इस्तेमाल करने वाले का नाम दर्ज हुआ?
क्या पुराने किरायेदार को दुकान आगे सौंपने का इख्तियार था?
और अगर तरीका दुरुस्त नहीं था तो इतने अरसे तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
नई कमेटी के लिए इसका सबसे साफ रास्ता यही है कि पुरानी आवंटन फाइलें, किराया रजिस्टर और जमा रकम का ब्यौरा देखा जाए।
दस्तावेज बोलेंगे तो अफवाहें खुद खामोश हो जाएंगी।
वजूखाना कहां गया और गुमटियों का हिसाब किसके पास है?
कब्रिस्तान के दूसरे हिस्से को लेकर भी लोगों के अपने सवाल हैं।
बताया जाता है कि यहां पहले वजूखाना हुआ करता था। बाद के वर्षों में वहां छोटी-छोटी गुमटियां बना दी गईं, जहां अब फूल वगैरह बेचने वालों को जगह दी गई है।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक इन गुमटियों से तकरीबन एक हजार रुपये महीना किराया लिए जाने की चर्चा है।
अब असल सवाल किराए की रकम का नहीं है।
असल सवाल उसका हिसाब है।
रकम कौन वसूल करता है?
रसीद कौन देता है?
क्या वसूली की रकम वक्फ या कब्रिस्तान के अधिकृत खाते में जाती है?
इन गुमटियों का आवंटन किस फैसले के तहत हुआ?
यदि तमाम रकम बाकायदा हिसाब-किताब में दर्ज है तो उसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए।
वक्फ की आमदनी का हिसाब जुबानी रवायत से नहीं, रसीद और रजिस्टर से चलना चाहिए।
रब्बानी दरबार की तरफ जमीन का इस्तेमाल भी सवालों में
कब्रिस्तान की रब्बानी दरबार की ओर वाली दीवार के करीब की जमीन को लेकर भी स्थानीय स्तर पर शिकायतें हैं।
सूत्रों के मुताबिक यहां ईंट, रेत और गिट्टी का कारोबार किया जा रहा है। निर्माण सामग्री आसपास तक फैलने की शिकायत भी सामने आती रही है।
नई कमेटी को सबसे पहले यह मालूम करना होगा कि जिस जमीन पर कारोबार हो रहा है उसकी कानूनी हैसियत क्या है।
अगर जमीन निजी है तो बात वहीं खत्म हो जाती है।
लेकिन अगर जमीन वक्फ या कब्रिस्तान की मिल्कियत में आती है तो फिर सवाल उठेगा कि इस्तेमाल किसकी इजाजत से हो रहा है।
क्या कोई किराया तय है?
क्या बाकायदा अनुबंध मौजूद है?
क्या रकम जमा होती है?
और अगर कोई इजाजत नहीं है तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कब्रिस्तान से जुड़ी जमीन का एक-एक हिस्सा दर्ज और महफूज होना चाहिए।
वीरा गेट के आसपास भी कई दावे और शिकायतें
कब्रिस्तान के गेट नंबर-1, जिसे स्थानीय तौर पर वीरा गेट कहा जाता है, के आसपास भी कारोबारी गतिविधियों और जगह के इस्तेमाल को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं।
कहीं बिरयानी के कारोबार का जिक्र होता है, कहीं दुकाननुमा ढांचे दिखाई देने की बात कही जाती है।
कुछ स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ व्यक्तियों ने खुद जगह घेरने के साथ दूसरों को भी जगह उपलब्ध कराई और उनसे किराया लिया।
कई हिस्सों में कबाड़ और सामान रखने की शिकायत भी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ स्थानों पर सामान सड़क तक आ जाने से आवाजाही प्रभावित होती है।
इन तमाम दावों में कितना सच है, इसका फैसला अंदाजों से नहीं होना चाहिए।
नई कमेटी जमीन की पैमाइश और सीमांकन कराए।
वक्फ रिकॉर्ड और मौके की स्थिति का मिलान कराया जाए।
इसके बाद सार्वजनिक तौर पर साफ किया जाए कि कौन अधिकृत किरायेदार है, किसे किस शर्त पर जगह मिली है और कौन बिना दस्तावेज जमीन का इस्तेमाल कर रहा है।
नई कमेटी के सामने भरोसा बहाल करने का मौका
सात साल बाद बनी कमेटी के सामने यह एक मौका भी है।
वह चाहे तो शुरुआत ही हिसाब से करे।
दुकानों की मुकम्मल फेहरिस्त तैयार की जाए।
हर दुकान का मूल किरायेदार दर्ज हो।
मौजूदा इस्तेमाल करने वाले का नाम दर्ज किया जाए।
किराया और बकाया अलग-अलग लिखा जाए।
गुमटियों से होने वाली आमदनी का ब्यौरा तैयार किया जाए।
कब्रिस्तान की जमीन का सीमांकन कराया जाए।
और हर साल आमदनी तथा खर्च की जानकारी समाज के सामने रखी जाए।
यह कदम किसी पर इल्जाम लगाने के लिए नहीं, बल्कि आगे के लिए साफ निज़ाम कायम करने के लिए जरूरी हैं।
जहां हिसाब खुला होता है, वहां शक कम होते हैं।
हामिद अंसारी को मिली मुबारकबाद
नई कमेटी के अध्यक्ष मोहम्मद हामिद अंसारी को सामाजिक और सियासी हलकों से भी मुबारकबाद मिल रही है।
वरिष्ठ भाजपा नेता रिजवान अंसारी, अंजुमन वक्फ बोर्ड कमेटी के अध्यक्ष अनवर अन्नू, मोमिन ईदगाह कमेटी के अध्यक्ष राशिद अंसारी और रवीन्द्रनाथ टैगोर वार्ड से जुड़े कांग्रेस नेता आबिद मंसूरी ने हामिद अंसारी को नई जिम्मेदारी मिलने पर मुबारकबाद दी है।
इन लोगों ने उम्मीद जाहिर की कि नई कमेटी कब्रिस्तान की साफ-सफाई, इंतज़ाम, वक्फ संपत्तियों की हिफाजत और पारदर्शी कामकाज को प्राथमिकता देगी।
मोहम्मद वसीम बोले—बेहतर काम में साथ रहेंगे
कब्रिस्तान एक्शन कमेटी के अध्यक्ष मोहम्मद वसीम ने भी नई कमेटी का इस्तकबाल करते हुए सहयोग का भरोसा दिया है।
उनका कहना है कि कब्रिस्तान की बेहतरी के लिए नई कमेटी जो भी जायज़ और सकारात्मक कदम उठाएगी, उसमें उनकी ओर से पूरा सहयोग रहेगा।
मुबारकबाद का सिलसिला अपनी जगह है।
मगर नई कमेटी की असल पहचान उसके काम से बनेगी।
लोग अब यह देखना चाहेंगे कि दुकानों का बकाया वसूला जाता है या नहीं, जमीन की सही हैसियत सामने आती है या नहीं और कब्रिस्तान की आमदनी का मुकम्मल हिसाब दर्ज होता है या नहीं।
सात बरस बाद नई कमेटी आई है।
अब जरूरत इस बात की है कि पुरानी उलझनों का भी कोई सिरा निकले।
क्योंकि वक्फ की जमीन किसी शख्स की जागीर नहीं, समाज की अमानत होती है।
और अमानत की हिफाजत के साथ उसका हिसाब देना भी उतना ही जरूरी होता है।
