जबलपुर। मध्यप्रदेश के समस्त शासकीय विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में वर्ष 2017 से छात्रसंघ चुनाव आयोजित न किए जाने के मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब तलब करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। बुधवार को माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया एवं माननीय न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ के समक्ष इस जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देशित किया कि दो सप्ताह के भीतर शैक्षणिक सत्र 2026-27 का अकादमिक कैलेंडर जारी कर उसमें छात्रसंघ गठन एवं चुनाव संबंधी प्रक्रिया को स्पष्ट किया जाए तथा इसकी जानकारी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अदनान अंसारी की ओर से अधिवक्ता अक्षरदीप ने न्यायालय को अवगत कराया कि प्रदेश सरकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित लिंगदोह समिति की सिफारिशों का प्रभावी अनुपालन करने में विफल रही है। याचिका में कहा गया कि वर्ष 2017 से प्रदेश के शासकीय उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रसंघ गठन की प्रक्रिया पूर्णतः ठप है, जिससे विद्यार्थियों के प्रतिनिधित्व, नेतृत्व विकास के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। इस पर खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों तथा लिंगदोह समिति की अनुशंसाओं का पालन अनिवार्य है। न्यायालय ने मौखिक रूप से कहा कि विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया से वंचित नहीं रखा जा सकता।
वहीं राज्य शासन की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 का अकादमिक कैलेंडर तैयार किए जाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक वर्ष अकादमिक कैलेंडर में छात्रसंघ गठन का प्रावधान किया जाता है, किन्तु विभिन्न प्रशासनिक कारणों से चुनाव संपन्न नहीं हो सके। उन्होंने न्यायालय को आश्वस्त किया कि इस वर्ष जारी होने वाले अकादमिक कैलेंडर में छात्रसंघ गठन संबंधी प्रावधान का स्पष्ट उल्लेख किया जाएगा।
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