चित्तौड़गढ़। भारतीय इतिहास में चित्तौड़गढ़ का नाम सामान्यतः बप्पा रावल, मेवाड़ और राजपूत वीरता की परंपरा से जोड़ा जाता है, लेकिन पुरातात्विक प्रमाण इस इतिहास को कहीं अधिक पीछे ले जाते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाइयों और चित्तौड़ के आसपास मिले अभिलेखीय व मुद्राशास्त्रीय प्रमाण यह संकेत देते हैं कि यहां बप्पा रावल से बहुत पहले भी मानव बस्ती, धार्मिक गतिविधियां और संगठित सामाजिक जीवन मौजूद था। Pasted text
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था, ग्वालियर के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने अपने शोध आलेख में चित्तौड़ को केवल एक मध्यकालीन दुर्ग के रूप में देखने के बजाय एक दीर्घकालीन सांस्कृतिक भू-दृश्य के रूप में समझने पर जोर दिया है। उनके अध्ययन में चित्तौड़ की पहाड़ी, निकटवर्ती नगरी-मध्यमिका, प्राचीन सिक्कों, अभिलेखों और धार्मिक अवशेषों को एक साथ रखकर इतिहास की परतें पढ़ने का प्रयास किया गया है।
दुर्ग से पहले भी थी बस्ती
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की 1957-58 और 1958-59 की उत्खनन रिपोर्टों में चित्तौड़ दुर्ग की सुरक्षा-दीवारों के नीचे ऐसे सांस्कृतिक निक्षेप मिलने का उल्लेख है, जो दुर्ग बनने से पहले की मानव बस्ती की ओर संकेत करते हैं।
खुदाई में प्राकृतिक धरातल के ऊपर फर्श, दीवारों और संरचनात्मक गतिविधियों के प्रमाण मिले। बाद के स्तरों में मिट्टी की प्राचीर तथा पकी ईंटों से सुदृढ़ीकरण भी सामने आया। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि चित्तौड़ की पहाड़ी का उपयोग केवल बाद के राजकीय दुर्ग के रूप में नहीं हुआ था।
मृद्भांडों ने बढ़ाई प्राचीनता की संभावना
उत्खनन में Northern Black Polished Ware (NBPW) यानी उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृद्भांड की उपस्थिति भी दर्ज की गई है। यह सामग्री प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
हालांकि शोध में सावधानी बरतते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि केवल किसी विशेष प्रकार के मृद्भांड के आधार पर किसी स्थल को सीधे मौर्य अथवा अशोककालीन घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए अधिक ठोस डेटिंग और प्रत्यक्ष साक्ष्यों की आवश्यकता होती है।
चित्तौड़ से 11 किलोमीटर दूर प्राचीन मध्यमिका
चित्तौड़ के प्राचीन इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है नगरी, जिसे प्राचीन मध्यमिका अथवा मज्झिमिका से जोड़ा जाता है। यह स्थल चित्तौड़ से लगभग 11 किलोमीटर उत्तर में स्थित है।
पुरातात्विक विवरणों में यहां प्राचीन संरचनाओं, मंदिर अवशेषों, सिक्कों और बौद्ध स्तूपों का उल्लेख मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि चित्तौड़ क्षेत्र का प्राचीन इतिहास केवल वर्तमान दुर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि आसपास एक विस्तृत नगरीय और सांस्कृतिक क्षेत्र विकसित था।
सिबि जनपद के सिक्के भी महत्वपूर्ण
नगरी और चित्तौड़ क्षेत्र से प्राप्त सिक्कों पर “मज्झिमिकाय सिबि-जनपदस” जैसी अभिलेखीय परंपरा मिलने का उल्लेख किया गया है। ये सिक्के मध्यमिका और सिबि जनपद के संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
इससे यह संकेत मिलता है कि मध्यमिका केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी एक संगठित नगरी भी रही होगी।
वैष्णव, बौद्ध और शैव—तीनों परंपराओं के प्रमाण
नगरी के निकट हाथीबाड़ा और घोषुंडी अभिलेखों में संकर्षण और वासुदेव से संबंधित धार्मिक निर्माण का उल्लेख मिलता है, जो प्रारंभिक वैष्णव या भागवत परंपरा की उपस्थिति की ओर संकेत करता है। Pasted text
वहीं नगरी क्षेत्र में बौद्ध स्तूपों के अवशेषों का उल्लेख भी मिलता है। शोध में इसे बौद्ध उपस्थिति का संकेत माना गया है, लेकिन इसे सीधे अशोककालीन गतिविधि का प्रमाण नहीं माना गया।
बाद के काल में शैव परंपरा से जुड़े महादेव मंदिर और अन्य अभिलेख भी सामने आते हैं। इससे चित्तौड़-मध्यमिका क्षेत्र की धार्मिक विविधता स्पष्ट होती है।
बौद्धकालीन होना और अशोककालीन होना अलग बात
शोध का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि बौद्ध उपस्थिति और अशोककालीन उपस्थिति को एक नहीं माना गया है। किसी स्थल पर बौद्ध स्तूप मिलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वहां सम्राट अशोक स्वयं आए थे या उसी समय निर्माण कराया गया था।
इसके लिए अशोक के अभिलेख, स्पष्ट मौर्यकालीन स्थापत्य या वैज्ञानिक रूप से दिनांकित पुरातात्विक परतों जैसे प्रत्यक्ष प्रमाण जरूरी होंगे। Pasted text
मौर्य और मोरी को एक मानना उचित नहीं
चित्तौड़ के इतिहास में अक्सर “मौर्य” और “मोरी” नामों को लेकर भ्रम देखने को मिलता है। शोध में स्पष्ट किया गया है कि केवल नाम-समानता के आधार पर मोरी शासकों को मौर्य सम्राटों का प्रत्यक्ष वंशज मानना इतिहाससम्मत नहीं होगा।
दोनों अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़े प्रश्न हैं और इनके बीच संबंध सिद्ध करने के लिए वंशावली, अभिलेख, सिक्के तथा पुरातात्विक प्रमाण आवश्यक होंगे।
बप्पा रावल महत्वपूर्ण अध्याय, लेकिन शुरुआत नहीं
शोध के अनुसार बप्पा रावल का चित्तौड़ और मेवाड़ के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन उन्हें चित्तौड़ के इतिहास का आरंभ बिंदु नहीं माना जाना चाहिए।
पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि चित्तौड़ की पहाड़ी पर उनसे बहुत पहले भी मानव गतिविधियां मौजूद थीं। इस दृष्टि से बप्पा रावल चित्तौड़ के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय हैं, लेकिन प्रथम अध्याय नहीं।
आगे और वैज्ञानिक शोध की जरूरत
अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि चित्तौड़ की पूर्व-दुर्ग परतों का आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से पुनर्मूल्यांकन किया जाए। नगरी और चित्तौड़ के बीच प्राचीन मार्गों, जल स्रोतों और बस्तियों का GIS आधारित सर्वेक्षण, पुराने सिक्कों और अभिलेखों का पुनः अध्ययन तथा पुरातात्विक सामग्री की वैज्ञानिक डेटिंग की जानी चाहिए। Pasted text
इतिहास केवल युद्धों और राजवंशों तक सीमित नहीं
अध्ययन का निष्कर्ष है कि चित्तौड़ को केवल राजपूत गौरव, युद्धों या किसी एक राजवंश के माध्यम से समझना अधूरा दृष्टिकोण होगा। यहां दुर्ग से पहले की बस्ती, प्राचीन नगरीय जीवन, सिक्कों की अर्थव्यवस्था, वैष्णव, बौद्ध और शैव परंपराएं तथा बाद की राजनीतिक सत्ताएं मिलकर एक लंबा और बहुस्तरीय इतिहास रचती हैं।
यह शोध इस ओर इशारा करता है कि यदि चित्तौड़ और मध्यमिका की पुरातात्विक सामग्री का आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से पुनः परीक्षण किया जाए, तो इस क्षेत्र की प्राचीनता और भारतीय इतिहास में उसकी भूमिका को लेकर कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं।
