जबलपुर। देश की आज़ादी के कई वर्ष पूर्व में ही जबलपुर में देवी प्रतिमा की स्थापना शहर के भीतर बंगाली समाज द्वारा की गई, कालांतर में दुर्गा पूजा दशहरा जबलपुर की एक पहचान बन गई, इस विषय पर न जाने कितने गीत, डाक्यूमेंट्री, लघु सिनेमा इत्यादि बने, ऐसा भी माना जाता है की जबलपुर का दशहरा कोलकाता दुर्गा पूजा के बाद सबसे भव्य कार्यक्रमों में से एक है। अंग्रेजों के समय से ही रक्षा विभाग स्थापित हुए जिसके चलते बंगाली, मराठी, दक्षिण भारतीय, एंग्लो इंडियन, उत्तर भारत के व्यक्ति नौकरी की तलाश में जबलपुर आ गए और व्हीकल फैक्ट्री, आर्डिनेंस फैक्ट्री खमरिया, गन कैरेज फैक्ट्री और ग्रे आयरन फ़ाउंडरी जैसे संस्थान में लग गए।
उत्तर भारत से बहुत मात्रा में मुस्लिम समाज का भी आना हुआ पूर्व से ही जबलपुर में मुसलमान थे आगे चलकर समाज विकसित होता गया, पूरे विश्व में अनूठा माना जाने वाला मुहर्रम इस शहर में मनाया जाता है। सुंदरता देखिए तो इस त्योहार को हिंदुओं द्वारा बढ़ चढ़कर मनाया जाता है।
अधिवक्ता पंकज दुबे तथा व्यवसायी दीपक सेठी ने बताया की इस मुहर्रम और दशहरा के आयोजन से हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलता है। मूर्तिकारों की पूरे साल की आय, टेंट लाइट साउंड, बैंड,शहनाई, तमाशा दिखाने वाले, छोटे बड़े वाहन व्यवसाई, यहाँ तक की जबलपुर के लंबे ट्राले आस पास के जिलों की झांकी के लिए बुलाए जाते, भोजन के स्टॉल , हलवाई और कारीगरीं को भरपूर काम मिलता है।
बिजली आपूर्ति के लिए विद्युत कंपनी अतिरिक्त बिजली क्रय करती है, राजस्व अमला पूरी रात सड़क पर रहता है।
