संशोधन कानून और अध्यादेश रद्द
जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ न्यायमूर्ति आनंद पाठक एवं न्यायमूर्ति विनय सराफ ने राज्य सरकार के वर्ष 2019 के अध्यादेश और संशोधन अधिनियम 2019 को असंवैधानिक घोषित करते हुए खारिज कर दिया। जिसके तहत ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामला आरक्षण देने का नहीं, बल्कि उसकी सीमा का है। ओबीसी वर्ग लोक सेवाओं और उच्च शिक्षा में 14% आरक्षण पाने का हकदार है, 27% का नहीं।न्यायालय ने इंद्रा साहनी और जयश्री पाटिल मामलों का हवाला देते हुए दोहराया कि आरक्षण की कुल 50% की सीमा का पालन अनिवार्य है। राज्य में ऐसी कोई असाधारण या आपात स्थिति सिद्ध नहीं हुई, जो 50% की सीमा को पार करने की अनुमति दे।
भर्ती व उच्च शिक्षा के आंकड़ों, राजनीतिक स्थिति और सामाजिक संदर्भों का विश्लेषण कर न्यायालय ने पाया कि अनुच्छेद 16(4) के तहत ओबीसी वर्ग का लोक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व है और वे मुख्यधारा में शामिल हैं। आरक्षण का आधार 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व' नहीं हो सकता। अदालत ने पाया कि 2019 का निर्णय 1983 की 40 साल पुरानी महाजन आयोग रिपोर्ट पर आधारित था और निर्णय लेने से पूर्व राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से अनिवार्य संवैधानिक परामर्श भी नहीं किया गया था। बाद में लाई गई 2023 की ब्राउस रिपोर्ट भी बहुत सीमित सैंपल और गैर-तुलनात्मक होने के कारण ठोस आधार नहीं मानी गई।
भर्तियों एवं नियुक्तियों के संबंध में न्यायालय द्वारा
29 सितंबर 2022 से पहले की नियुक्तियां सुरक्षित रखते हुये 8 मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 (GAD द्वारा 87-13% फॉर्मूला लागू करने की तिथि) के बीच 14% से अधिक (यानी 27% तक) पर नियुक्त हो चुके ओबीसी उम्मीदवारों की सेवाएं सुरक्षित रहेंगी, उन्हें हटाया नहीं जाएगा। इन अतिरिक्त पदों को आगामी तीन भर्ती अभियानों में समायोजित किया जाएगा। 29 सितंबर 2022 के बाद 87% पदों पर ही अंतिम परिणाम दिए गए थे और 13% पद रोके गए थे। अदालत ने निर्देश दिया है कि शेष 13% पदों पर अब अनारक्षित (UR) श्रेणी के अभ्यर्थियों को नियुक्ति देकर कुल पदों को 100% पूरा किया जाए। एमपीपीएससी, म.प्र. कर्मचारी चयन मंडल और अन्य भर्ती एजेंसियों को आदेश दिया गया है कि वे आगामी 3 माह के भीतर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को इन 13% पदों पर नियुक्ति देने की प्रक्रिया पूरी करें।
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