जबलपुर। हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कैबिनेट मंत्री शाह के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति नहीं दिए जाने के मामले में गंभीर कानूनी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी सक्षम न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद जानबूझकर उसका पालन नहीं किया जाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार यह न्यायालय की अवमानना का विषय बन सकता है। हालांकि, अवमानना का अंतिम निर्धारण संबंधित न्यायालय ही करेगा।
अधिवक्ता ठाकुर ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 215 के तहत हाईकोर्ट को ‘कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड’ का दर्जा प्राप्त है तथा वे अपने आदेशों की अवमानना के लिए कार्रवाई कर सकते हैं। उनके अनुसार, न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवहेलना होने पर Contempt of Courts Act, 1971 के तहत सिविल अवमानना का प्रश्न उठ सकता है।
उन्होंने कहा कि विधि का शासन (Rule of Law) संविधान की मूल संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने वर्ष 2004 के M.P. Special Police Establishment बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति से जुड़े मामले में राज्यपाल की भूमिका और मंत्रिपरिषद के निर्णय की न्यायिक समीक्षा के महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किए थे। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि यदि मंत्रिपरिषद के निर्णय में पक्षपात की उचित आशंका हो या निर्णय अतार्किक हो, तो राज्यपाल कुछ परिस्थितियों में अपने विवेक का प्रयोग कर सकते हैं। (Indian Kanoon)
अभियोजन स्वीकृति में स्वतंत्र निर्णय जरूरी
रामेश्वर सिंह ठाकुर ने मंसुखलाल विठ्ठलदास चौहान बनाम गुजरात राज्य (1997) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि अभियोजन स्वीकृति देने या न देने का निर्णय सक्षम प्राधिकारी को संबंधित सामग्री और साक्ष्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार करने के बाद लेना होता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि न्यायालय स्वयं अभियोजन स्वीकृति देने वाले प्राधिकारी की भूमिका नहीं निभा सकता और सक्षम प्राधिकारी को अपना स्वतंत्र विवेक इस्तेमाल करना होता है। (Indian Kanoon)
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि स्वीकृति का उद्देश्य निर्दोष लोक सेवकों को झूठे और परेशान करने वाले मुकदमों से सुरक्षा देना है, लेकिन इसे दोषी के लिए ढाल नहीं बनाया जा सकता। स्वीकृति देने वाला प्राधिकारी उपलब्ध सामग्री पर स्वतंत्र रूप से अपना दिमाग लगाए और किसी बाहरी दबाव से प्रभावित न हो, यह महत्वपूर्ण है। (Indian Kanoon)
सुब्रमण्यम स्वामी मामले का भी दिया हवाला
अधिवक्ता ने सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, सीबीआई मामले का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन स्वीकृति की व्यवस्था को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई ही रुक जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में अनुच्छेद 14 के तहत समानता और विधि के समान संरक्षण के सिद्धांतों पर भी विचार किया था। (Gujarat High Court)
BNSS में 120 दिन की समय-सीमा
अधिवक्ता ठाकुर ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 218 में अभियोजन स्वीकृति को लेकर महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। प्रावधान के अनुसार सरकार को स्वीकृति के अनुरोध की प्राप्ति से 120 दिनों के भीतर निर्णय लेना है। निर्धारित अवधि में निर्णय नहीं होने पर स्वीकृति दिए जाने की वैधानिक व्यवस्था लागू होती है। (BPRD)
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभियोजन स्वीकृति के प्रश्न में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 और BNSS की धारा 218 के प्रावधानों को मामले के तथ्यों के अनुसार अलग-अलग देखना जरूरी है। हाल के न्यायिक निर्णयों में भी यह अंतर सामने आया है कि BNSS की धारा 218 में 120 दिन के बाद deemed sanction का प्रावधान है, जबकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 में अलग व्यवस्था है। (Indian Kanoon)
अधिवक्ता ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालय के आदेश, अभियोजन स्वीकृति के लिए भेजे गए प्रस्ताव की तारीख, सक्षम प्राधिकारी के निर्णय और लागू वैधानिक प्रावधानों का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा। उनके मुताबिक यदि किसी न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवहेलना का तथ्य स्थापित होता है, तो संबंधित अधिकारी या प्राधिकारी की व्यक्तिगत जवाबदेही का प्रश्न भी न्यायालय के समक्ष उठ सकता है।
