जबलपुर | बालाघाट जिले के बैगा बहुल इलाकों से अगस्त माह में बच्चों की लगातार मौतों की खबर केवल एक स्थानीय स्वास्थ्य घटना नहीं है। बिरसा विकासखंड के कोण्डेकसा, बोंदारी, मछुल्दा, कोरका और आसपास के बैगा बहुल गांवों में बुखार तथा अन्य गंभीर लक्षणों के बाद बच्चों की मौत की खबर सामने आई है। सरकारी स्तर पर मृत बच्चों की संख्या आठ बताई गई है, जबकि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने 19 बच्चों की मौत का आरोप लगाया है। इसलिए अंतिम मृत्यु संख्या और बीमारी के कारणों का निर्धारण स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच के बाद ही किया जाना चाहिए। बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राजकुमार सिन्हा ने बताया क़ि कुछ रिपोर्टों में बुखार, चकत्ते तथा कुछ मामलों में किडनी से संबंधित गंभीर लक्षणों का उल्लेख है।
बैहर, बालाघाट में 436 परिवारों के 1,197 लोगों पर किए गए सामुदायिक अध्ययन में पाया गया कि पूर्व-स्कूली बैगा बच्चों में दुर्बलता 42.3 प्रतिशत थी, जबकि उसी संदर्भ में ग्रामीण मध्यप्रदेश के बच्चों में यह लगभग 23.8 प्रतिशत थी। वयस्कों में भी क्रोनिक एनर्जी डिफीसिएन्सी अत्यधिक थी,पुरुषों में 55.8 प्रतिशत और महिलाओं में 62.9 प्रतिशत। अध्ययन में अनाज और मोटे अनाज के अलावा अन्य खाद्य पदार्थों तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का सेवन अनुशंसितम है, मध्यप्रदेश में योजनाएं हैं। बजट है। आंगनवाड़ी है। आहार अनुदान है। पोषण अभियान है। पीएम-जनमन है। स्वास्थ्य विभाग का पूरा ढांचा है। फिर भी यदि किसी दूरस्थ बैगा बस्ती में बच्चे कुपोषण, संक्रमण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के बीच मरते हैं तो समस्या योजना की अनुपस्थिति नहीं, योजना और जमीन के बीच की दूरी है। वैज्ञानिक अध्ययन वर्षों पहले बता चुके हैं कि बैगा समुदाय में कुपोषण गहरा और बहुआयामी है। अब अगस्त 2026 की घटनाएं सरकार को फिर उसी चेतावनी के सामने खड़ा कर रही हैं।इसलिए सरकार को तत्काल तीन काम करने चाहिए, बाल मृत्यु की स्वतंत्र जांच, प्रत्येक बैगा बस्ती का स्वास्थ्य-पोषण ऑडिट और पीएम-जनमन तथा आहार अनुदान सहित सभी योजनाओं का ग्राम स्तर पर सामाजिक ऑडिट।
आदिवासी विकास की असली सफलता तब मानी जाएगी जब सरकारी रिपोर्टों में योजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि बैगा बच्चों के स्वस्थ जीवन की गारंटी दिखाई दे।
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