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पर्यावरण कानूनों की सर्वोच्चता का निर्णायक संदेश



जबलपुर | भारत में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस लंबे समय से चल रही है। सड़क, बांध, खनन, ताप विद्युत संयंत्र, औद्योगिक परियोजनाओं और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों जैसी बड़ी परियोजनाओं को आर्थिक विकास का आधार बताया जाता है, लेकिन इनके निर्माण से पहले पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन और संभावित नुकसान से बचाव भी कानून की अनिवार्य मांग है। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला पर्यावरणीय शासन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने केंद्र सरकार के 7 जुलाई 2021 के उस कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरेंडम) को निरस्त कर दिया, जिसके जरिए उन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया उपलब्ध कराई गई थी, जो आवश्यक पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी हासिल किए बिना निर्माण या संचालन शुरू कर चुकी थीं। पर्यावरण विद बरगी बांध विस्थापित व पुनर्वास संघ के राजकुमार सिन्हा ने बताया की सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे। यह फैसला मूलतः इस सवाल से जुड़ा है कि क्या कार्यपालिका महज एक प्रशासनिक कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से उस कानूनी व्यवस्था को बदल सकती है, जिसके तहत किसी परियोजना को शुरू करने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी लेना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट का उत्तर स्पष्ट है कि किसी वैधानिक व्यवस्था को महज प्रशासनिक आदेश के जरिए कमजोर या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।

आने वाले समय में इस फैसले की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि सरकारें और परियोजना प्राधिकरण इसे केवल न्यायिक आदेश के रूप में देखते हैं या विकास की पूरी प्रक्रिया में पर्यावरणीय जवाबदेही के अनिवार्य सिद्धांत के रूप में स्वीकार करते हैं।कानून का अर्थ यही है कि विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए हो।

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