जबलपुर | ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई की हत्या के बाद ईरान में सत्ता विरोधी जनविद्रोह भड़काना था, जो पूरी तरह विफल हो गई। बल्कि कई मामलों में इसका उल्टा प्रभाव देखने को मिला है। ईरान में शोक कार्यक्रमों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ शांति समझौता समाप्त घोषित किए जाने के बाद, अमेरिका ने क्रेशम द्वीप, सिरिक, बंदर अब्बास और चाबहार समेत कई ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया है। विदेश मामलो के जानकार राजकुमार सिन्हा ने बताया कि जून में हुए संघर्ष विराम समझौते के टूटने के बाद से यह विवाद फिर से गहरा गया है। जवाबी कार्यवाही में ईरान ने बहरीन, कतर और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए हैं। इसके अलावा ईरान ने बुशहर के पास अमेरिका का एक ड्रोन (एमक्यू-9) मार गिराने का दावा किया है। अमेरिका- ईरान के बीच हुए सीजफायर समझौता खत्म होने के बाद ईरान की रणनीति आक्रामक और सख्त जवाबी कार्यवाही करने पर केंद्रित हो गई है। ईरान स्पष्ट कर चुका है कि वह दबाव के आगे नहीं झुकेगा और अमेरिकी हमलों या प्रतिबंधों का पूरी ताकत से जवाब देगा।यदि अमेरिका प्रतिबंधों को और कड़ा करता है या सैन्य कार्रवाई बढ़ाता है, तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आक्रामक तरीके से फिर से तेज कर सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे ताजा युद्ध का मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण, तेल आपूर्ति मार्गों और क्षेत्र में सामरिक वर्चस्व को लेकर उपजा प्रत्यक्ष सैन्य टकराव है। जून में हुए संघर्ष विराम समझौते के टूटने के बाद से यह विवाद फिर से गहरा गया है।
यथार्थवादी दृष्टिकोण से निष्कर्ष यह निकलता है कि अमेरिका, ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों की वर्तमान नीतियां किसी वैचारिक टकराव से अधिक अपनी-अपनी सुरक्षा, शक्ति और रणनीतिक हितों की रक्षा तथा क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश हैं। यही प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया की राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा तय करेगी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय संकट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा और विश्व अर्थव्यवस्था पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
