ग्रेटर इजराइल की चुनौती से संकट में समझौता और बदलता पश्चिम एशिया



पाकिस्तान, जो कतर के साथ मिलकर इस मध्यस्थता प्रक्रिया का नेतृत्व कर रहा है, ने अमेरिका - ईरान के बीच समझौते में गारंटर की भूमिका निभाई है। स्विट्जरलैंड में अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधि तकनीकी और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत करने मौजूद थे। इस समझौते में अगले 60 दिनों के भीतर एक अंतिम और व्यापक समझौते तक पहुंचने के लिए आगे भी बातचीत जारी रखना शामिल है। परन्तु स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में रविवार को अमेरिका-ईरान के बीच उच्च स्तरीय वार्ता के दौरान तनाव बढ़ गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की धमकियों से नाराज होकर ईरानी टीम ने बातचीत बंद कर दी। वाशिंगटन और तेहरान के बीच हाल ही में हुए समझौते के अनुसार सैन्य कार्यवाही को स्थायी रूप से रोकने का प्रावधान था, जिसमें लेबनान पर इजराइल द्वारा किया जाने वाला सैन्य हमले भी शामिल था। ईरान इन वार्ताओं के लिए लेबनान में इजराइली हमलों को रोकने को एक केंद्रीय शर्त के रूप में रखा था। परन्तु

अमेरिका-ईरान समझौते और 'ग्रेटर इजराइल' के विस्तारवादी दृष्टिकोण के बीच गहरा भू-राजनीतिक अंतर्विरोध है। जहां एक ओर ग्रेटर इजराइल का एजेंडा पूरे पश्चिम एशिया में अपनी सीमाओं का विस्तार और ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को खत्म करना चाहता है, वहीं अमेरिका-ईरान शांति समझौता ईरान को मान्यता देता है, जिससे इजराइल के इन चरम लक्ष्यों को बड़ा झटका लगा है। ग्रेटर इजराइल का सपना 'नील से फरात'  तक के भू-भाग पर यहूदी नियंत्रण स्थापित करने की ऐतिहासिक और धार्मिक विचारधारा पर आधारित है। दूसरी ओर, इस क्षेत्र में ईरान एक प्रमुख शिया शक्ति है जो  सबसे बड़ी बाधा है। अमेरिकी-ईरान समझौते ने ईरान की स्थिति को मजबूत किया है और उसे वैधता प्रदान की है, जो इजराइल की क्षेत्रीय महात्वाकांक्षाओं के बिल्कुल विपरीत है।अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते में इजराइल को शामिल नहीं किये जाने से वह नाराज है क्योंकि उसे अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मध्य पूर्व  की रणनीति को लेकर सीधे तौर पर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।शांति समझौते के बावजूद इजराइल द्वारा लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर लगातार की जा रही बमबारी से अमेरिकी प्रशासन बेहद नाराज है।अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि नेतन्याहू ट्रम्प के इस शांति समझौते को कमजोर करने के लिए कदम उठा सकता है। इस समझौते ने बैंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक करियर के तीन मजबूत आधारों को तोड़ दिया है और देश की सुरक्षा को लेकर उन्हें एक नई दुविधा में फंसा दिया है। नेतन्याहू ने  ईरान मुद्दे को इसराइल की सुरक्षा के लिए सबसे अहम बना दिया हो, वह ईरान के साथ युद्ध को एक ऐसे मोड़ पर कैसे खत्म कर सकता है, जिसमें ईरान मज़बूत स्थिति में दिख रहा हो? कुछ ही महीनों में इसराइल में आम चुनाव होने हैं।जबकि दशकों से नेतन्याहू मतदाताओं के सामने सुरक्षा का मुद्दा ही मुख्य रूप से रखते आए हैं। अब इस बात को लोगों तक पहुंचाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।इसी सुरक्षा को लेकर नेतन्याहू की इसराइली सेनाओं ने गजा, लेबनान और सीरिया के बड़े इलाकों पर कब्जा किए हुए है। इजराइल का मानना है कि इस डील से ईरान अपनी आक्रामक नीतियों को और तेज करेगा। इजराइल का मानना है कि इस समझौते से ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को नुकसान नहीं पहुंचेगा, और वह भविष्य में परमाणु हथियार बनाने के अपने लक्ष्य को जारी रख सकता है।डील में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके द्वारा समर्थित प्रॉक्सी आतंकवादी समूहों जैसे हमास और हिज्बुल्लाह को मिलने वाले समर्थन का कोई समाधान नहीं किया गया है। प्रतिबंधों में ढील और रुकी हुई फ्रिज संपत्ति  जारी होने से ईरान को अरबों डॉलर प्राप्त होंगे, जिसका इस्तेमाल वह क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने के लिए कर सकता है। सैन्य और तकनीकी मामलों में इजरायल ज्यादा ताकतवर माना जाता है, लेकिन रणनीतिक आकार, मिसाइल भंडार और जनशक्ति के मामले में ईरान का पलड़ा भारी है। ईरान और हिज्बुल्लाह की शर्त के अनुसार लेबनान से इजरायली सेना वापसी का मुद्दा भी शांति समझौते में शामिल किए जाने के प्रयास हो रहे हैं, जिस पर इजराइल सहमत नहीं है।इजराइल इस समझौते से खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है क्योंकि वह लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ हमले जारी रखना चाहता है। जबकि धरातल पर इजराइल -हिज्बुल्लाह के बीच नए संघर्ष विराम के बावजूद तनाव जारी है। लेबनान-इजराइल संघर्ष का मुख्य कारण लेबनान में स्थित ईरान-समर्थित सशस्त्र समूह हिज्बुल्लाह और इजराइल के बीच का दीर्घकालिक भू-राजनीतिक और सैन्य तनाव है। यह विवाद मुख्य रूप से हिज्बुल्लाह द्वारा इजराइल को मान्यता न देने, सीमा पार रॉकेट हमलों और बफर ज़ोन की मांग जैसे मुद्दों पर केंद्रित है।दोनों देशों के बीच 1978 और 1982 के इजराइली आक्रमण और 2006 के इजराइल - लेबनान युद्ध का एक लंबा इतिहास है। हिज्बुल्लाह लेबनान का एक शिया चरमपंथी संगठन और राजनीतिक दल है, जिसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली गैर-राज्य सैन्य बलों में से एक माना जाता है। हलांकि 2024-2026 के सैन्य संघर्षों में इजराइली हमलों के कारण इसकी क्षमताएं काफी कमजोर हुई है।इजराइली सेना ने दक्षिणी लेबनान पर करीब 1982 से 2000 तक कब्ज़ा बनाए रखा।हिजबुल्लाह ने लगातार गुरिल्ला हमलों से इजराइली सेना को इतना थका दिया कि मई 2000 में इज़राइल को दक्षिणी लेबनान से पूरी तरह पीछे हटना पड़ा।इस घटना ने हिज़्बुल्लाह को लेबनान और पूरे अरब जगत में एक महानायक बना दिया। लेबनान ने दावा किया कि वे अरब इतिहास की पहली ऐसी ताकत हैं जिसने इजराइल को अपनी जमीन छोड़ने पर मजबूर किया। 

पश्चिमी एशिया में जारी संघर्ष और कूटनीतिक प्रयासों में हालिया घटनाओं के कारण इजराइल की भूमिका पर वैश्विक स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है।हालिया अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में, इजराइल की छवि को दुनिया के अधिकांश देशों में नकारात्मक रूप में आंका गया है। प्यू रिसर्च सेंटर  के वैश्विक सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया के 36 देशों में 67 प्रतिशत आबादी का इजराइल के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण है, जो क्षेत्रीय शांति और कूटनीति में उसकी आक्रामक रणनीतियों को दर्शाता है।विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल की आक्रामक रणनीतियों और हमास तथा हिजबुल्लाह जैसे समूहों के साथ निरंतर टकराव ने एक स्थायी और व्यापक शांति योजना को बाधित किया है।पश्चिम एशिया  का इतिहास संघर्षों, कूटनीतिक समझौतों और क्षेत्रीय विवादों से भरा रहा है। आधुनिक मध्य पूर्व कूटनीति के इतिहास में, शांति हमेशा क्षणभंगुर वस्तु रही है। 

मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) के समीकरण जून 2026 में पूरी तरह बदल चुका है, जहां हालिया सैन्य टकरावों और उसके बाद हुए ऐतिहासिक अमेरिका और ईरान के बीच हस्ताक्षरित 14-सूत्रीय शांति समझौते ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा दी है।समझौते के तहत ईरान के युद्ध-पश्चात पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय राहत की रूपरेखा तैयार की गई है, जो ईरान को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में वापस लाएगी। इस क्षेत्र के देश अब सैन्य गठबंधनों के बजाय खुद को वैश्विक लॉजिस्टिक्स और नए व्यापार मार्गों के केंद्र के रूप में स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और अन्य खाड़ी देश अब केवल तेल निर्यातक अर्थव्यवस्थाओं तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे पर्यटन, वित्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा और वैश्विक लॉजिस्टिक्स हब बनने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसलिए वे क्षेत्रीय संघर्षों के बजाय स्थिरता और आर्थिक एकीकरण को प्राथमिकता दे रहे हैं। अमेरिका के सीधे तौर पर समझौते में शामिल होने से चीन और रूस जैसी शक्तियों को मध्य पूर्व के आर्थिक पुनर्निर्माण विशेषकर ईरान और सीरिया में निवेश करने और अपना प्रभाव बढ़ाने का नया मौका मिलेगा।अमेरिका अब पश्चिम एशिया में सीधे सैन्य हस्तक्षेप की पुरानी नीति से हटकर संतुलनकारी कूटनीति की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। यूक्रेन युद्ध, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की चुनौती और घरेलू आर्थिक दबावों के कारण अमेरिका अपने संसाधनों का पुनर्वितरण कर रहा है। इस कारण वह क्षेत्रीय युद्धों को सीमित कर व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों की स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है। भारत के लिए पश्चिम एशिया अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है क्योंकि उसकी ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की आजीविका और व्यापारिक हित इस क्षेत्र से जुड़े हैं। क्षेत्रीय स्थिरता भारत के लिए लाभकारी होगी, लेकिन उसे अमेरिका, इजराइल, ईरान, खाड़ी देशों और उभरते चीन-रूस प्रभाव के बीच संतुलित कूटनीति बनाए रखनी होगी पश्चिम एशिया अब केवल संघर्षों का भूगोल नहीं रह गया है, बल्कि यह 21वीं सदी की नई वैश्विक शक्ति-संरचना का केंद्र बन रहा है। अमेरिका-ईरान समझौता, इजराइल की सुरक्षा चिंताएं, ईरान की क्षेत्रीय भूमिका, चीन-रूस की बढ़ती भागीदारी और आर्थिक संपर्क गलियारों की प्रतिस्पर्धा मिलकर एक ऐसी नई व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं, जिसका प्रभाव आने वाले दशकों तक वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर दिखाई देगा।

राज कुमार सिन्हा

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

सादर प्रकाशनार्थ

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