नई दिल्ली/रायसेन। सिमराई, जिला रायसेन में 132 केवी विद्युत ट्रांसमिशन लाइन को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने दौलतराम इंजीनियरिंग सर्विसेज लिमिटेड और नासा कॉर्पोरेशन की विशेष अनुमति याचिका में हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया है। इससे मंडीदीप क्षेत्र में नाहर समूह की करीब 417.96 करोड़ रुपये की औद्योगिक परियोजना के आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने 31 अगस्त 2026 को WP No. 49694/2025 में दौलतराम इंजीनियरिंग और नासा कॉर्पोरेशन की याचिका खारिज कर दी थी। मामला 132 KV DCSS Mandideep-Nahar Transmission Line के दूसरे सर्किट की स्ट्रिंगिंग से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने माना था कि वैधानिक शक्तियों के तहत स्वीकृत ट्रांसमिशन लाइन के लिए भूमि स्वामी की सहमति अनिवार्य नहीं है और उपलब्ध वैकल्पिक मार्गों में स्वीकृत अलाइनमेंट को मनमाना नहीं कहा जा सकता।
निजी भूमि के ऊपर से लाइन ले जाने का था विवाद
दौलतराम इंजीनियरिंग और नासा कॉर्पोरेशन ने आपत्ति जताई थी कि उनकी फैक्ट्री और भूमि के ऊपर से 132 केवी विद्युत लाइन उनकी अनुमति के बिना नहीं ले जाई जा सकती। याचिकाकर्ताओं ने सुरक्षा और वैकल्पिक अलाइनमेंट का भी मुद्दा उठाया था।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि वैकल्पिक मार्ग तकनीकी कारणों से उपयुक्त नहीं था, क्योंकि वह गैस पाइपलाइन के आवश्यक सुरक्षा अंतर का उल्लंघन करता। अदालत ने यह भी नोट किया कि परियोजना राज्य सरकार से विशेष सुविधाएं प्राप्त एक बड़े औद्योगिक निवेश से जुड़ी है और 13 में से 9 टावर पहले ही खड़े किए जा चुके थे।
सुप्रीम कोर्ट में 20 मीटर ऊंचाई का आश्वासन
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से यह चिंता जताई गई कि टावर नंबर 7 और 8 के बीच लाइन 20 मीटर की बजाय 15 मीटर की ऊंचाई पर ले जाने की व्यवस्था की जा रही है। प्रतिवादी पक्ष ने स्पष्ट किया कि संबंधित लाइन जमीन से 20 मीटर की ऊंचाई पर ही चलाई जाएगी। इस आश्वासन को दर्ज करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
नाहर पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता नरिंदरपाल सिंह रूपराह सहित अधिवक्ताओं ने पैरवी की। हाईकोर्ट ने लगाया था खर्च, सुप्रीम कोर्ट ने दी राहत
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को खारिज करते हुए प्रत्येक पर एक-एक लाख रुपये का खर्च लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने मूल आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन याचिकाकर्ताओं पर लगाया गया यह खर्च हटाने की राहत दी।
418 करोड़ की परियोजना आगे बढ़ने का रास्ता साफ
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में परियोजना की लागत 417.96 करोड़ रुपये दर्ज की थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रांसमिशन लाइन के मामले में हस्तक्षेप से इनकार किए जाने के बाद परियोजना के शेष कार्यों पर कानूनी रोक नहीं रही। परियोजना से रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
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