ग्वालियर। महिलाओं के भूमि अधिकार को केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने तक सीमित रखने के बजाय जमीन पर वास्तविक नियंत्रण, आजीविका, आर्थिक लाभ और निर्णय लेने की भागीदारी से जोड़ने की जरूरत है। इसी उद्देश्य से 23 सितंबर 2026 को ग्वालियर में महिलाओं के भूमि अधिकारों पर राज्य स्तरीय परामर्श आयोजित किया गया। इसमें महिला भूमि स्वामित्व के साथ वन अधिकार, ग्रामसभा में भागीदारी तथा सहरिया सहित PVTG समुदायों के Habitat Rights को लेकर नीति स्तर पर विस्तृत विमर्श किया गया।
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे द्वारा तैयार शोध आलेख में कहा गया है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाएं किसान, कृषि श्रमिक, पशुपालक और वन उपज संग्रहकर्ता के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन भूमि के स्वामित्व, उत्तराधिकार, अभिलेखीय अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी कई स्तरों पर सीमित दिखाई देती है।
कानून में अधिकार, लेकिन जमीन के रिकॉर्ड तक पहुंच बड़ी चुनौती
आलेख के मुताबिक महिलाओं के भूमि अधिकारों में पितृसत्तात्मक सामाजिक परंपराएं, कानूनी जानकारी की कमी, उत्तराधिकार के बाद नामांतरण में देरी, भूमि अभिलेखों में नाम दर्ज न होना, संयुक्त स्वामित्व का सीमित इस्तेमाल और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता प्रमुख चुनौतियां हैं।
इसलिए महिला भूमि अधिकार को कानून → अभिलेख → वास्तविक नियंत्रण → आर्थिक उपयोग → निर्णयकारी भागीदारी की पूरी श्रृंखला के रूप में देखने की आवश्यकता बताई गई है।
11.89 लाख महिला परिचालन धारकों का उल्लेख
कृषि जनगणना 2015-16 के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए आलेख में बताया गया है कि मध्यप्रदेश में लगभग 11.89 लाख महिला परिचालन धारक थीं और उनके द्वारा संचालित क्षेत्र करीब 15.09 लाख हेक्टेयर था।
हालांकि आलेख में स्पष्ट किया गया है कि परिचालन जोत को सीधे कानूनी स्वामित्व नहीं माना जा सकता। इसलिए यह अलग-अलग जानना जरूरी है कि जमीन किसके नाम है, उसका संचालन कौन कर रहा है और उससे होने वाली आय तथा फैसलों पर वास्तविक नियंत्रण किसका है।
सहरिया-PVTG महिलाओं के Habitat Rights पर विशेष जोर
परामर्श में विशेष रूप से सहरिया सहित PVTG समुदायों की महिलाओं के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित किया गया। आलेख के अनुसार इन समुदायों के अधिकारों को केवल व्यक्तिगत कृषि भूमि तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
जंगल, जल, चरागाह, सामुदायिक भूमि, लघु वनोपज, सांस्कृतिक स्थल, पारंपरिक आवास क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधन भी उनकी जीवन व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसलिए Habitat Rights को आवास, प्राकृतिक संसाधन, आजीविका, संस्कृति और सामुदायिक निर्णय के समग्र अधिकार के रूप में देखने का सुझाव दिया गया।
तहसील और ब्लॉक स्तर पर सहायता केंद्र बनाने का सुझाव
राज्य स्तरीय परामर्श में महिलाओं के भूमि अधिकार प्रभावी बनाने के लिए उत्तराधिकार अथवा वैधानिक हस्तांतरण के बाद समयबद्ध नामांतरण, संयुक्त स्वामित्व को प्रोत्साहित करने और ग्राम स्तर पर महिलाओं को सरल भाषा में कानूनी जानकारी देने की जरूरत बताई गई।
इसके साथ तहसील अथवा ब्लॉक स्तर पर महिला भूमि अधिकार सहायता केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है, जहां महिलाओं को नामांतरण, उत्तराधिकार और भूमि अभिलेख से संबंधित प्रक्रियाओं में सहायता मिल सके।
हर जिले का हो ‘महिला भूमि अधिकार सूचकांक’
आलेख में मध्यप्रदेश के लिए Women Land Rights Index विकसित करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इसमें महिला के नाम भूमि अभिलेख, संयुक्त स्वामित्व, उत्तराधिकार, समयबद्ध नामांतरण, वास्तविक भूमि नियंत्रण, कृषि संबंधी फैसलों में भागीदारी, कृषि आय पर नियंत्रण, ऋण और सरकारी योजनाओं तक पहुंच, वन अधिकार तथा ग्रामसभा में निर्णयकारी भूमिका जैसे संकेतकों को शामिल करने का सुझाव है।
‘नाम से अधिकार, अधिकार से नियंत्रण’
परामर्श में भविष्य की नीति के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र सामने रखा गया—महिला के नाम जमीन दर्ज होना पहला कदम है, अंतिम लक्ष्य नहीं। अधिकार तभी प्रभावी होगा जब महिला जमीन के उपयोग, उत्पादन, उससे मिलने वाली आय और उससे जुड़े फैसलों में वास्तविक भूमिका निभाए।
इसी आधार पर नीति का सूत्र रखा गया है—“नाम से अधिकार, अधिकार से नियंत्रण, नियंत्रण से आजीविका और आजीविका से सम्मान।” सहरिया और अन्य PVTG समुदायों के लिए इसके साथ वन अधिकार, Habitat Rights, सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार और महिलाओं की निर्णयकारी भागीदारी को भी जोड़ने की बात कही गई है।
