उच्च न्यायालय ने पॉक्सो अधिनियम के तहत दोष सिद्धि निरस्त की



जबलपुर।  मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की पीठ ने एक आपराधिक अपील में अपीलकर्ता की सजा को रद्द करते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो अधिनियम), डिंडौरी द्वारा पारित निर्णय के तहत अपीलकर्ता मुकेश पंड्रो को पॉक्सो में दोषी ठहराते हुए क्रमशः पहले व दूसरे अपराध हेतु 5-5 वर्ष के सश्रम कारावास तथा तीसरे अपराध हेतु 20 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी।

उच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि पीड़िता एक वयस्क सहमति देने वाली महिला है, जो अपनी स्वेच्छा से अपीलकर्ता के साथ गई थी तथा उसने अपीलकर्ता के विरुद्ध कार्यवाही जारी रखने की इच्छा व्यक्त नहीं की, क्योंकि दोनों के बीच पारस्परिक संबंध थे। पीड़िता की जन्मतिथि को लेकर अभिलेखों में विरोधाभास पाया गया। जन्म प्रमाण-पत्र घटना से लगभग 11 वर्ष पश्चात वर्ष 2018 में बनवाया गया था, जबकि पीड़िता की माता के कथन के आधार पर, जिसे न तो पक्षद्रोही घोषित किया गया और न ही पुनः परीक्षित किया गया, कि उसने पीड़िता का प्रथम कक्षा में प्रवेश 7-8 वर्ष की आयु में कराया था, न्यायालय ने पीड़िता का जन्म वर्ष 2005 निर्धारित किया।

न्यायालय ने पाया कि इस आधार पर घटना फरवरी 2024 के समय पीड़िता की आयु 18 वर्ष से अधिक थी। न्यायालय ने अभिलेख पर उपलब्ध डी.एन.ए. रिपोर्ट अपीलकर्ता के पक्ष में सकारात्मक होने के तथ्य पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष दिया कि अभियोजन पक्षकार पीड़िता को घटना के समय नाबालिग साबित करने में असफल रहा, तथा तदनुसार विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषसिद्धि व सजा का आदेश विधि की दृष्टि में कायम रखने योग्य नहीं है। परिणाम स्वरूप उच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि एवं दंडादेश को अपास्त कर दिया और निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता किसी अन्य प्रकरण में अपेक्षित न हो, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता शीर्ष अग्रवाल एवं शिवम कछावाहा द्वारा पैरवी की गई।

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