आधारताल पुलिस ने 90 कार्टून देशी शराब पकड़कर कायम किया था मामला अब सवाल, शराब कहां से आई, कहां जानी थी और नेटवर्क की तह तक क्यों नहीं पहुंची जांच?
पुलिस के सामने खुद पर पेट्रोल डालने की घटना ने खड़े किए सवाल कौन है पर्दे के पीछे का सूत्रधार और आखिर किसके भरोसे इतना हौसला?
जबलपुर। एक तरफ एक-दो नहीं बल्कि पूरी मल्टी बिल्डिंग के 1000 से ज्यादा रहवासियों के परेशान होकर शिकायत करने का दावा, दूसरी तरफ पुलिस तक सामूहिक शिकायत पहुंचाने के दौरान करीब 300 से अधिक लोगों की मौजूदगी का दावा और इन सबके बीच पुलिस के सामने अपने ऊपर पेट्रोल डालने का घटनाक्रम।
तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर लेमा गार्डन में चल क्या रहा है?
और उससे भी बड़ा सवाल....
अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग एक साथ शिकायत कर रहे हैं तो गोहलपुर पुलिस आखिर कर क्या रही है?
लेमा गार्डन के रहवासियों द्वारा पुलिस अधीक्षक तक पहुंचाई गई शिकायत में नगमा बानो, उनके पति जसवीर सिंह संधू, भाई गुलाम और पिता लम्बू लस्सी पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि क्षेत्र में आए दिन विवाद, गाली-गलौज और कथित दबंगई से लोग परेशान हैं। घरों के बाहर खड़े वाहनों को नुकसान पहुंचाने तथा बाहर से लोगों को बुलाकर क्षेत्र में भय और दबाव का माहौल बनाने जैसे आरोप भी आवेदन में लगाए गए हैं।
आरोपों की सत्यता जांच का विषय है। लेकिन सवाल इसलिए गंभीर हो जाता है क्योंकि शिकायत किसी एक व्यक्ति या एक परिवार तक सीमित नहीं बताई जा रही।
स्थानीय लोगों का दावा है कि मल्टी बिल्डिंग परिसर के 1000 से ज्यादा रहवासी इस पूरे घटनाक्रम से परेशान हैं।
इतना ही नहीं, शिकायतकर्ताओं के मुताबिक पुलिस को शिकायत देने के दौरान भी करीब 300 से ज्यादा महिला-पुरुष और स्थानीय रहवासी एकजुट होकर पहुंचे थे।
अगर यह आंकड़ा सही है तो सवाल सिर्फ नगमा बानो या शिकायतकर्ताओं से नहीं है।
सवाल सीधे गोहलपुर पुलिस से भी है।
एक हजार लोगों की आवाज भी कम है क्या? गोहलपुर पुलिस से जवाब मांगते सवाल
मान लिया जाए कि दो परिवार लड़ रहे हैं तो पुलिस दोनों पक्षों को बुलाकर जांच करेगी।
दस लोग शिकायत करें तो पुलिस तथ्यों की पड़ताल करेगी।
लेकिन जब दावा हो कि एक पूरी मल्टी बिल्डिंग के एक हजार से अधिक लोग परेशान हैं और सैकड़ों लोग एक साथ शिकायत लेकर पुलिस तक पहुंच रहे हैं, तो इसे केवल सामान्य मोहल्ला विवाद मानकर छोड़ा जा सकता है क्या?
यदि रहवासियों ने पहले भी शिकायतें की हैं तो उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?
कितनी शिकायतें दर्ज हुईं?
कितनों की जांच हुई?
किस-किस के बयान लिए गए?
क्या इलाके के सीसीटीवी फुटेज जांचे गए?
क्या कथित तोड़फोड़ के मामलों में कोई कार्रवाई हुई?
और यदि शिकायतें झूठी थीं तो पुलिस ने शिकायतकर्ताओं को स्पष्ट क्यों नहीं किया कि आरोप निराधार हैं?
गोहलपुर पुलिस को इन सवालों के जवाब देने होंगे।
क्योंकि पुलिस की निष्पक्षता केवल एफआईआर लिखने से साबित नहीं होती। निष्पक्षता तब दिखाई देती है जब शिकायत चाहे कमजोर आदमी की हो या प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफकार्रवाई कानून और सबूत के आधार पर समान रूप से हो।
आधारताल पुलिस ने पकड़ी थी 90 कार्टून देशी शराब, मामला भी हुआ था कायम
इस कहानी का एक महत्वपूर्ण सिरा शराब के एक पुराने पुलिस प्रकरण से भी जुड़ता है।
शिकायत में उल्लेखित घटनाक्रम के मुताबिक 17 जून 2026 को आधारताल पुलिस ने 90 कार्टून देशी शराब पकड़ी थी और मामले में बाकायदा प्रकरण कायम किया गया था।
यानी शराब की बरामदगी और पुलिस कार्रवाई महज हवा में लगाया गया आरोप नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई से जुड़ा मामला बताया गया है।
अब सवाल आगे का है।
90 कार्टून शराब आई कहां से थी?
जानी कहां थी?
इसका सप्लायर कौन था?
रिसीवर कौन था?
इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क था या मामला कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित था?
और सबसे महत्वपूर्ण....
पुलिस की विवेचना इस नेटवर्क की जड़ों तक कहां तक पहुंची?
90 कार्टून शराब कोई जेब में रखकर ले जाने वाली चीज नहीं होती। इतनी मात्रा में शराब के परिवहन, भंडारण और वितरण के पीछे यदि कोई संगठित व्यवस्था थी तो उसकी पूरी श्रृंखला की जांच होना स्वाभाविक है।
इसीलिए लेमा गार्डन में उठ रहे मौजूदा विवादों और शराब प्रकरण को लेकर यदि शिकायतकर्ता किसी बड़े संरक्षण की आशंका जता रहे हैं तो पुलिस को अटकलों के बजाय सबूतों के आधार पर स्थिति साफ करनी चाहिए।
साढ़े सात लाख में कथित मकान सौदा! आवंटित मकान आखिर बिका कैसे?
शिकायत में एक और गंभीर मामला संपत्ति को लेकर उठाया गया है।
आवेदन के मुताबिक लेमा गार्डन स्थित मकान नंबर F-1, प्लॉट नंबर 01 कथित तौर पर किसी अन्य व्यक्ति के नाम आवंटित बताया गया है।
आरोप है कि इस मकान को करीब 7 लाख 50 हजार रुपये देकर खरीदा गया और मकान के आगे तथा पीछे अतिरिक्त हिस्से पर कथित कब्जा भी किया गया।
अगर आरोप गलत है तो दस्तावेज सामने रखकर मामला खत्म किया जा सकता है।
लेकिन अगर मकान किसी सरकारी योजना या निर्धारित नियमों के तहत किसी दूसरे व्यक्ति को आवंटित था तो सवाल गंभीर है...
क्या ऐसे मकान की खरीद-बिक्री की अनुमति थी?
किसके नाम मूल आवंटन हुआ?
किस दस्तावेज के आधार पर कब्जा बदला?
क्या कोई वैध रजिस्ट्री हुई?
क्या संबंधित विभाग से अनुमति ली गई?
और मकान के आगे-पीछे कथित अतिरिक्त कब्जे की शिकायत पर नगर निगम या प्रशासन ने कभी नाप-जोख कराई?
शिकायत में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत निर्मित एक अन्य मकान में कथित अनधिकृत रूप से रहने का आरोप भी लगाया गया है।
इन आरोपों की सच्चाई बयानबाजी से नहीं बल्कि नगर निगम, राजस्व और आवास संबंधी सरकारी रिकॉर्ड निकालने से कुछ ही समय में सामने आ सकती है।
वाहनों में तोड़फोड़ के आरोप सीसीटीवी क्यों नहीं बताएगा सच?
स्थानीय रहवासियों ने शिकायत में घरों के बाहर खड़े वाहनों को कथित रूप से नुकसान पहुंचाने के आरोप भी लगाए हैं।
अगर ऐसी घटनाएं हुई हैं तो सवाल है कि क्या पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली?
क्या क्षतिग्रस्त वाहनों की तस्वीरें या वीडियो पुलिस के पास जमा किए गए?
क्या प्रत्यक्षदर्शियों के बयान हुए?
यदि सबूत मौजूद हैं तो कार्रवाई कहां है?
और अगर सबूत नहीं मिले तो शिकायत की वास्तविकता क्या निकली यही वह जगह है जहां गोहलपुर पुलिस की निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच सारे आरोप-प्रत्यारोप खत्म कर सकती है।
लेकिन जांच लंबी खिंचेगी और शिकायतें बढ़ती रहेंगी तो सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी उठेंगे।
पुलिस के सामने पेट्रोल डालने का ‘हाईवोल्टेज ड्रामा’आखिर किसकी शह पर इतना हौसला? कौन है इस कहानी का असली सूत्रधार?
लेमा गार्डन विवाद का सबसे सनसनीखेज पहलू वह घटनाक्रम है जिसमें नगमा बानो द्वारा पुलिस की मौजूदगी में अपने ऊपर पेट्रोल डालने की बात सामने आई है।
शिकायतकर्ता पक्ष इसे पुलिस पर दबाव बनाने के लिए किया गया कथित ‘हाईवोल्टेज ड्रामा’ बता रहा है।
लेकिन अगर पुलिस के सामने वास्तव में ऐसा घटनाक्रम हुआ तो सवाल बेहद गंभीर हैं।
आखिर किसकी शह पर इतना हौसला?
कौन है इस पूरे खेल का सूत्रधार?
क्या यह भावावेश में उठाया गया कदम था या इसके पीछे पुलिस पर दबाव बनाने की कोई रणनीति थी?
और अगर शिकायतकर्ता इसे सुनियोजित घटनाक्रम बता रहे हैं तो उनके इस आरोप की सच्चाई क्या है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि घटना पुलिस की मौजूदगी में हुई बताई जा रही है।
फिर सच पता करना मुश्किल क्यों होना चाहिए?
मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों के बयान होंगे।
रोजनामचा रिकॉर्ड होगा।
सीसीटीवी या मोबाइल वीडियो हो सकते हैं।
प्रत्यक्षदर्शी मौजूद होंगे।
तो फिर गोहलपुर पुलिस पूरे घटनाक्रम की वास्तविकता सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं करती?
क्या पर्दे के पीछे कोई बड़ा खिलाड़ी? 90 कार्टून शराब के मामले से उठता है एक और सवाल
यहीं इस कहानी के दो सिरे सवाल पैदा करते हैं।
एक तरफ आधारताल पुलिस द्वारा 90 कार्टून देशी शराब पकड़े जाने और मामला कायम किए जाने का प्रकरण।
दूसरी तरफ लेमा गार्डन में इतने बड़े पैमाने पर रहवासियों के शिकायत करने का दावा और पुलिस के सामने पेट्रोल डालने जैसा घटनाक्रम।
क्या इन घटनाओं के बीच कोई संबंध है?
या ये पूरी तरह अलग-अलग घटनाएं हैं?
कहीं इसके तार किसी बड़े अवैध शराब या नशे के कारोबारी से तो नहीं जुड़े हैं?
क्या पर्दे के पीछे कोई ऐसा प्रभावशाली व्यक्ति है जो किसी पक्ष को संरक्षण दे रहा है?
आखिर कौन है वह सूत्रधार, जिसकी शह होने की चर्चा शिकायतकर्ता पक्ष कर रहा है?
इन सवालों का मतलब किसी व्यक्ति को बिना सबूत नशा कारोबारी घोषित करना नहीं है। लेकिन जब 90 कार्टून शराब की पुलिस बरामदगी और दर्ज प्रकरण का संदर्भ मौजूद हो, तो पुलिस को शराब की पूरी सप्लाई चेन और उससे जुड़े नेटवर्क की तह तक जाना चाहिए।
अगर कोई कनेक्शन नहीं है तो जांच उसे भी साफ कर देगी।
और अगर कोई कनेक्शन निकलता है तो सवाल होगा कि उस नेटवर्क के सबसे ऊपर कौन बैठा है?
गोहलपुर पुलिस पर सबसे बड़ा सवालकार्रवाई का इंतजार आखिर कब तक?
लेमा गार्डन की कहानी अब सिर्फ नगमा बानो बनाम कुछ रहवासियों की कहानी नहीं रह गई है।
यदि शिकायतकर्ताओं के दावे सही हैं तो एक हजार से ज्यादा लोगों की परेशानी को सामान्य विवाद कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
करीब 300 लोगों के एक साथ पुलिस तक पहुंचने का दावा अपने आप में असामान्य है।
ऐसे में गोहलपुर पुलिस के सामने अब दो ही रास्ते हैं...
या तो जांच कर साबित करे कि शिकायतों में लगाए गए आरोप गलत या अतिरंजित हैं।
या फिर यदि सबूत मिलते हैं तो कानून के मुताबिक कार्रवाई करेचाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।
लेकिन शिकायतें आती रहें, सैकड़ों लोग थाने और अधिकारियों के चक्कर लगाते रहें और मामला आरोप-प्रत्यारोप के बीच घूमता रहे तो पुलिस की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या किसी दबाव में है गोहलपुर पुलिस या सिर्फ जांच में हो रही देरी?
यही वह सवाल है जिसका जवाब अब पुलिस प्रशासन को देना चाहिए।
क्या गोहलपुर पुलिस पर किसी तरह का दबाव है?
क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण किसी पक्ष को हासिल है?
या वास्तविकता यह है कि मामला जटिल है और पुलिस तथ्यों की जांच कर रही है?
अगर पुलिस निष्पक्ष जांच कर रही है तो उसकी कार्रवाई और निष्कर्ष सामने आने चाहिए।
क्योंकि पुलिस पर बिना प्रमाण मिलीभगत का आरोप लगाना जितना गलत होगा, उतना ही गलत होगा सैकड़ों नागरिकों की सामूहिक शिकायत को बिना निर्णायक जांच के वर्षों तक फाइलों में घूमने देना।
लेमा गार्डन के लोग जवाब चाहते हैं।
90 कार्टून शराब कहां से आई और किसके लिए थी?
पुलिस के सामने पेट्रोल डालने वाले घटनाक्रम की वास्तविकता क्या थी?
मकान और कथित कब्जे की सच्चाई क्या है?
इतनी बड़ी संख्या में लोग शिकायत क्यों कर रहे हैं?
और सबसे बड़ा सवाल.....
आखिर पर्दे के पीछे कोई सूत्रधार है तो वह कौन है?
अब इन सवालों के जवाब अफवाहों, आरोपों और मोहल्ले की चर्चाओं से नहीं मिलने चाहिए।
गोहलपुर पुलिस, आधारताल के शराब प्रकरण की विवेचना और प्रशासनिक दस्तावेज इन तीनों की निष्पक्ष जांच ही लेमा गार्डन की इस पूरी कहानी का सच सामने ला सकती है।
