हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सेवा समाप्ति आदेश रद्द, शिक्षक के पुनर्स्थापन पर करें विचार

 


सेवा समाप्ति आदेश रद्द, शिक्षक को पुनर्स्थापित करने के निर्देश

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जिला दमोह निवासी प्राथमिक शिक्षक राहुल पटेल को बड़ी राहत देते हुए उनकी सेवा समाप्ति (टर्मिनेशन) का आदेश निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) को मामले पर मेरिट के आधार पर पुनर्विचार करने के निर्देश दिए हैं तथा स्पष्ट किया है कि यदि याचिकाकर्ता आरक्षण का लाभ लिए बिना भी चयन के योग्य पाया जाता है तो उसकी सेवा समाप्ति उचित नहीं मानी जाएगी।



जानकारी के अनुसार राहुल पटेल की नियुक्ति प्राथमिक शिक्षक के पद पर ओबीसी दिव्यांग कोटे के तहत हुई थी। नियुक्ति के बाद उनकी दिव्यांगता की पुनः जांच कराई गई, जिसमें विकलांगता 40 प्रतिशत से कम पाई गई। इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी दमोह ने उन्हें सेवा समाप्त करने के संबंध में नोटिस जारी किया।

याचिकाकर्ता ने नोटिस के जवाब में विभाग को बताया कि ओबीसी वर्ग की मेरिट सूची में उनकी 2417वीं रैंक थी तथा उन्होंने 108.68 अंक प्राप्त किए थे। उन्होंने दावा किया कि उनसे कम अंक प्राप्त करने वाले सैकड़ों अभ्यर्थियों को ओबीसी वर्ग में नियुक्ति दी गई है। साथ ही अनुरोध किया गया कि उनकी नियुक्ति को ओबीसी दिव्यांग श्रेणी से सामान्य ओबीसी श्रेणी में परिवर्तित किया जाए, जैसा कि अन्य मामलों में किया गया था।

याचिका में आरोप लगाया गया कि विभाग ने जवाब प्रस्तुत करने की निर्धारित समय-सीमा पूरी होने से पहले ही सेवा समाप्ति का आदेश जारी कर दिया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। इसके बाद राहुल पटेल ने हाईकोर्ट में याचिका क्रमांक 18535/2024 दायर कर सेवा समाप्ति आदेश को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 के साथ-साथ दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के आधार पर चुनौती दी।

मामले की सुनवाई जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं अधिवक्ता हितेंद्र कुमार गोह्लानी ने पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि विभाग ने बिना पर्याप्त विचार किए और बिना कारण बताए नॉन-स्पीकिंग आदेश जारी कर याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त कर दीं।

सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को संविधान सम्मत माना और सेवा समाप्ति आदेश को निरस्त करते हुए मामला पुनर्विचार के लिए जिला शिक्षा अधिकारी के पास भेज दिया। न्यायालय ने निर्देश दिए कि यदि मेरिट के आधार पर याचिकाकर्ता की नियुक्ति संभव थी, तो उसे सेवा से पृथक करना उचित नहीं होगा और उसके मामले में नया आदेश पारित किया जाए।

इस फैसले को शिक्षा विभाग में नियुक्ति और आरक्षण से जुड़े मामलों में प्राकृतिक न्याय तथा मेरिट के सिद्धांतों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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