*अधिकारी बदले, नेता बदले, सरकारें बदलीं, नहीं बदली तो सिर्फ वक्फ बोर्ड की कार्यशैली*
*मुहम्मद इदरीस राईन*
मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड की कहानी एक अजीब कहानी है। यहां कुर्सियां बदलती हैं, चेयरमैन बदलते हैं, सीईओ बदलते हैं, मंत्रियों के वादे बदलते हैं, लेकिन अगर कुछ नहीं बदलता तो वो है मस्जिदों, मदरसों और मजारों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुंडली मारकर बैठे लोगों का राज। आज हालत ये है कि मस्जिदें अल्लाह का घर कम और चंद परिवारों की खानदानी जागीर ज्यादा लगती हैं।
*जमीन दिखी, हिसाब गायब*
केंद्र सरकार ने उम्मीद पोर्टल लॉन्च करके एक सराहनीय काम किया। कम से कम कागज पर तो पता चला कि वक्फ के नाम कितनी जमीन है। इसके लिए सरकार बधाई की हकदार है। लेकिन दर्द यहीं से शुरू होता है। पोर्टल पर जमीन का खसरा नंबर है, नक्शा है, रकबा है, पर उस जमीन से हर महीने आने वाले हजारों रुपये के किराए का कोई जिक्र नहीं। मजारों पर चढ़ने वाले नज़राने का, ईद-बकरईद पर इकट्ठा होने वाले लाखों के चंदे का, कुर्बानी की खालों का हिसाब कहां है?
जब वक्फ की संपत्ति सार्वजनिक हो सकती है तो कमेटी का बैंक खाता सार्वजनिक क्यों नहीं हो सकता? आखिर ऐसी कौन सी पर्दादारी है जो 30-35 साल से उसी 4 लोगों के सीने में दफन है? सच तो ये है कि पर्दा इसलिए है क्योंकि अगर हिसाब की किताब खुल गई तो कई लोगों की दुकानें बंद हो जाएंगी।
*पीढ़ी-दर-पीढ़ी कब्जा* *खिदमत नहीं, विरासत*
तकलीफ इस बात की है कि बाप सदर था तो बेटा सदर बन गया, बेटा सदर है तो पोता लाइन में खड़ा है। जैसे मस्जिद उनके बाप-दादा ने अपने पैसों से खरीदी हो। वही घिसे-पिटे चेहरे, जो 30 साल से कमेटी पर काबिज हैं। हिसाब मांगो तो आंखें दिखाकर कहा जाता है कि अल्लाह के घर का हिसाब नहीं लिया जाता। अरे भाई, सबसे पहला हिसाब तो अल्लाह के घर का ही लिया जाना चाहिए, क्योंकि ये अमानत है, और अमानत में खयानत करने वाले से बड़ा कोई गुनहगार नहीं।
हमारे बुजुर्गों ने अपनी खून-पसीने की कमाई से ये जमीनें इसलिए वक्फ की थीं कि यहां से गरीब की बेटी का निकाह होगा, यतीम तालीम पाएगा, मुसाफिर को पनाह मिलेगी। आज उन बुजुर्गों की रूह भी रोती होगी कि उनकी दी हुई अमानत को चंद लोगों ने अपनी जागीर बना लिया है।
*कौम की खामोशी सबसे बड़ा* *गुनाह*
और सबसे बड़ा दर्द तो मुस्लिम कौम का है। मुस्लिम समाज आज भी गहरी नींद में सोया हुआ है। मस्जिदें लुट रही हैं, वक्फ की जायदादें खुर्द-बुर्द हो रही हैं, लेकिन कोई बोलने को तैयार नहीं। हमारे रहनुमा, हमारे जनप्रतिनिधि, हमारे मौलवी-मौलाना साहब अपनी ही दुनिया में मस्त हैं। जलसों में कौम को जगाने के नाम पर लंबी-लंबी तकरीरें, फोटो सेशन और चंदा, बस। अपनी ही मस्जिद की कमेटी से हिसाब मांगने की हिम्मत किसी में नहीं।
जब तक सब ठीक है तब तक खामोशी है और जब कोई हादसा हो जाता है, जब गाज गिरती है तो हम छाती पीट-पीट कर कहते हैं इस्लाम खतरे में है। अरे इस्लाम बाहर वालों से नहीं, हमारी अपनी खामोशी और हमारी अपनी कमेटियों की खयानत से खतरे में है।ं
कभी-कभी कोई ईमानदार और जज्बे वाला अफसर बोर्ड में आता भी है, तो हम जैसे लोगों को उम्मीद जगती है। लेकिन वो भी नीचे से ऊपर तक फैले भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में फंसकर रह जाता है। सिस्टम ही ऐसा बना दिया गया है कि ईमानदारी यहां चल ही नहीं सकती।
वक्त आ गया है कि उम्मीद पोर्टल अब हिसाब पोर्टल बने। जैसे संपत्ति दिख रही है, वैसे ही हर मस्जिद का बैंक स्टेटमेंट, आमदनी और खर्च भी ऑनलाइन दिखे। वरना याद रखिए, जब कौम का भरोसा वक्फ बोर्ड और कमेटियों से उठ जाएगा तो लोग मस्जिदों को चंदा देना ही बंद कर देंगे। और आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी, वो कहेंगी कि तुम्हारे सामने अल्लाह की अमानत लुटती रही और तुम तमाशा देखते रहे।
(लेखक जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
.jpg)