ग्वालियर। महिलाओं के वन, भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को केवल कागजी स्वामित्व तक सीमित न रखकर उसे आजीविका, आर्थिक लाभ और निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति में बदलने की जरूरत है। इसी विषय को लेकर 23 सितंबर 2026 को ग्वालियर में राज्य स्तरीय परामर्श आयोजित किया जाएगा। इसमें वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन, महिलाओं की भागीदारी और मौजूदा चुनौतियों पर चर्चा प्रस्तावित है।
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे द्वारा तैयार नीति दस्तावेज में मध्यप्रदेश की मौजूदा स्थिति के साथ महिलाओं के वन एवं भूमि अधिकारों को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव रखे गए हैं।
6.27 लाख दावे, 2.94 लाख अधिकार-पत्र
दस्तावेज में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के 31 जुलाई 2025 तक के आंकड़ों के आधार पर बताया गया है कि मध्यप्रदेश में वन अधिकार अधिनियम के तहत 6,27,513 दावे प्राप्त हुए। इनमें 5,85,326 व्यक्तिगत और 42,187 सामुदायिक दावे थे।
कुल 2,94,877 अधिकार-पत्र (Title Deeds) वितरित किए गए, जबकि 3,22,407 दावे अस्वीकृत हुए। प्राप्त दावों की तुलना में वितरित अधिकार-पत्रों का अनुपात 46.99 प्रतिशत बताया गया है।
महिलाओं के नाम कितने अधिकार, इसका अलग आंकड़ा नहीं
दस्तावेज में एक महत्वपूर्ण डेटा गैप की ओर ध्यान दिलाया गया है। उपलब्ध राज्यवार FRA आंकड़ों में महिला, पुरुष और संयुक्त नाम से दिए गए अधिकार-पत्रों का अलग-अलग विवरण उपलब्ध नहीं है।
इसी आधार पर Gender-disaggregated FRA data तैयार करने और महिला, पुरुष तथा संयुक्त अधिकारों का अलग डिजिटल रिकॉर्ड रखने की जरूरत बताई गई है।
जमीन पर काम और जमीन पर अधिकार में अंतर
कृषि जनगणना 2015-16 के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए दस्तावेज में बताया गया है कि मध्यप्रदेश में 1,00,03,135 operational holdings में से 11,88,621 यानी 11.88 प्रतिशत महिलाओं द्वारा संचालित थीं।
नीति दस्तावेज में जोर दिया गया है कि जमीन पर काम करना, जमीन का मालिक होना और उस जमीन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार—तीनों अलग-अलग स्थितियां हैं। इसलिए यह भी देखा जाना चाहिए कि भूमि किसके नाम है, महिला संयुक्त स्वामी है या नहीं और भूमि से होने वाली आय पर उसका कितना नियंत्रण है।
हर वन ग्राम में महिला FRA सहायता व्यवस्था का प्रस्ताव
महिलाओं को वन अधिकारों के दावे दाखिल करने, पुराने दस्तावेज जुटाने और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने में आने वाली कठिनाइयों को देखते हुए प्रत्येक वन ग्राम में महिला FRA सहायता व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया गया है।
इसके साथ महिला स्वयं सहायता समूहों को FRA जागरूकता से जोड़ने, दस्तावेजी एवं कानूनी सहायता उपलब्ध कराने और अस्वीकृत दावों की ग्राम सभा स्तर पर समीक्षा की सिफारिश की गई है।
महिलाओं के लिए अलग ‘राइट्स इंडेक्स’ का सुझाव
दस्तावेज में मध्यप्रदेश के प्रत्येक जिले के लिए Women Forest, Land & Resource Rights Index बनाने का सुझाव भी दिया गया है। इसमें महिलाओं के नाम FRA अधिकार-पत्र, संयुक्त अधिकार, ग्राम सभा और सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन में भागीदारी, वन आधारित महिला स्वयं सहायता समूह, लघु वनोपज से आय और PVTG महिलाओं के Habitat Rights जैसे संकेतकों को शामिल करने की बात कही गई है।
राज्य सरकार के लिए 10 सूत्रीय नीति प्रस्ताव
23 सितंबर के राज्य स्तरीय परामर्श के लिए तैयार प्रस्तावों में FRA आंकड़ों को महिला-पुरुष के आधार पर अलग करने, प्रत्येक वन ग्राम में महिलाओं के लिए कानूनी सहायता तंत्र बनाने, अस्वीकृत दावों की समीक्षा, सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी और प्रत्येक जिले की Women Forest & Land Rights Report Card जारी करने जैसे सुझाव शामिल हैं।
सरकार, ग्राम सभा, महिला संगठनों, नागरिक समाज और शोध संस्थानों को जोड़कर स्थायी State-Level Women Forest & Land Rights Monitoring Forum बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
नीति दस्तावेज का केंद्रीय विचार है कि सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि महिलाओं को कितने अधिकार-पत्र मिले, बल्कि यह भी देखा जाए कि कितनी महिलाएं उन अधिकारों का वास्तविक उपयोग कर रही हैं, उनकी आय कितनी बढ़ी और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में उनकी भूमिका कितनी मजबूत हुई।
