जबलपुर। 20 हजार रुपये के लेन-देन के विवाद में दर्ज मारपीट के एक मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के दोषमुक्ति आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है, इसलिए बरी किए गए आरोपितों के खिलाफ हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
अपर सत्र न्यायाधीश के.के. मिश्रा ने अपने निर्णय में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों का किया गया मूल्यांकन विधिसम्मत और तार्किक है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोषमुक्ति के आदेश में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं पाई गई, इसलिए उसे यथावत रखा जाता है।
मामले में आरोपितों की ओर से अधिवक्ता अशोक जायसवाल ने पैरवी करते हुए दलील दी कि घटना के संबंध में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास हैं और पूरी कहानी विश्वसनीय नहीं है। न्यायालय ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद इस तर्क को स्वीकार किया।
अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता के बयान, प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) और अन्य साक्ष्यों में महत्वपूर्ण विसंगतियां मौजूद हैं। वहीं, स्वतंत्र गवाहों ने भी अभियोजन के पक्ष का अपेक्षित समर्थन नहीं किया। मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी आरोपों की पुष्टि करने में सक्षम नहीं पाए गए।
निर्णय में न्यायालय ने कहा कि आपराधिक मामलों में किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आरोपों का संदेह से परे प्रमाणित होना आवश्यक है। केवल अनुमान या कमजोर साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
