200 साल पुराना "पापा उस्ताद का अखाड़ा"
जबलपुर। करबला के मैदान में हक और इंसानियत की हिफाजत के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले इमाम हुसैन और उनके 72 जानिसारों की शहादत को याद करते हुए महा नगर में मोहर्रम का पर्व अकीदत के साथ मनाया जा रहा है। इशा की नमाज के बाद नगर के इमामबाड़ों की सवारियां बाबाओं की आमदके साथ रन करने निकलीं। शहनाई की शहीदी धुन के बीच सवारियों ने मदन महल दरगाहों व इमामबाड़ों में हाजरी पेश की।
वहीं सदर गली नंबर 12 में पापा उस्ताद काअखाड़ा हकीदत मनदो जियारत का केंद्र बना हुआ है। सभी समुदाय के लोग इस अखाड़े में माथा टेकने आ रहे हैं।
सवाददाता मुस्तान खान की बातचीत दादा पापा उस्ताद के पोते तौकीर खान जी से हुई।
उन्होंने बताया कि ये अखाड़ा 200 साल पुराना है और अब *छठवीं पीढ़ी* इसकी देखरेख कर रही है। लोग इस अखाड़े पर बहुत यकीन रखते हैं।
मुहर्रम पर यहां खास जुड़ाव देखने को मिलता है। ये सिर्फ अखाड़ा नहीं, जबलपुर की विरासत है।
*चांदी का ताजिया - आकर्षण का केंद्र*
सदर गली नंबर 9 में रखा जाने वाला *चांदी का ताजिया* दूर-दूर से लोगों को खींच लाता है। इसकी शिल्पकला और भव्यता देखते ही बनती है।
*ऐतिहासिक परंपराएं जो आज भी जिंदा हैं*
*कत्ल की रात 9 मुहर्रम*: कोतवाली और सदर में 80 मीनारों तक ऊंचे विशाल ताजिए निकलते हैं।
*अजादारी और एकता*
इमाम हुसैन की शहादत की याद में मजलिसें, मातम और जुलूस — सब कुछ पारंपरिक तरीके से होता है। सदर, गोहलपुर, कोतवाली, हनुमान ताल — हर इलाका अपनी-अपनी रौनक दिखाता है।
*ये सिर्फ मुहर्रम नहीं है ये गंगा-जमुनी तहजीब की जीती-जागती मिसाल है*। जहां 200 साल पुराने अखाड़े, चांदी के ताजिए और 80 मीनारों वाले ताजिए एक साथ आकर जबलपुर को खास बनाते हैं।
जबलपुर की 200 साल पुरानी विरासत और मुहर्रम की भव्यता की बात सुनकर मन गदगद हो गया। पापा उस्ताद के अखाड़े और चांदी के ताजिये जैसी परंपराएं ही तो हमारी गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान हैं।
लंगर, शरबत और ठंडे पानी का इंतजाम किया था। मोहर्रम पर्व नगर में गंगा-जमुना तहजीब की मिसाल बना हुआ है।
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