जबलपुर। दीवानी न्यायालयों एवं उच्च न्यायालय में लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग को लेकर अधिवक्ताद्वय आनन्द चावला एवं विद्या शंकर मिश्रा द्वारा दायर जनहित याचिका को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने निरस्त कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश श्री अल्पेश यशवंत कोगजे एवं न्यायमूर्ति श्री विवेक रुसिया की खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अशोक लालवानी जी ने सर्वोच्च न्यायालय के रामरमेश्वरी देवी बनाम निर्मला देवी, एन.जी. दस्ताने बनाम श्रीकांत एस. शिवदेव, दलीप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तथा महिला विनोद कुमारी बनाम मध्यप्रदेश राज्य के न्याय दृष्टांतों का हवाला दिया।
याचिकाकर्ताओं ने अनावश्यक स्थगन, झूठे दावे, गलत दस्तावेज एवं शपथ-पत्र तथा बेबुनियाद मुकदमेबाजी पर प्रभावी रोक लगाने और ऐसे मामलों में वास्तविक लागत एवं हर्जाना लगाए जाने के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट के रामरमेश्वरी देवी मामले का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि मुकदमे को अनावश्यक रूप से लंबा नहीं खींचा जाना चाहिए और दोषी पक्ष पर वास्तविक एवं उचित लागत लगाई जा सकती है। यदि किसी अंतरिम आदेश के कारण प्रतिपक्ष संपत्ति के उपयोग से वंचित होता है, तो अंतिम निर्णय के अनुरूप वास्तविक क्षति की भरपाई के लिए यथार्थवादी मेस्ने प्रॉफिट (मध्यवर्ती लाभ), लागत एवं रेस्टिट्यूशन (पूर्व स्थिति की बहाली) का आदेश दिया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अनावश्यक स्थगन तथा विभिन्न अंतरिम आवेदनों के कारण मामलों के निपटारे में देरी हो रही है। उनका यह भी कहना था कि कई अंतरिम आवेदनों के अंतिम निराकरण में तीन से चार महीने तक का समय लग जाता है तथा बेबुनियाद मुकदमेबाजी और झूठे शपथ-पत्रों के लिए प्रभावी आर्थिक दंड की आवश्यकता है।
केवल स्थगन ही देरी का कारण नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि मामलों के लंबित रहने और उनके निपटारे में देरी का एकमात्र कारण स्थगन नहीं है। मध्यप्रदेश में लंबित मामलों की संख्या की तुलना में न्यायाधीशों की संख्या अधिक महत्वपूर्ण चुनौती है। इसके अलावा न्यायालय कक्षों, आधारभूत सुविधाओं और मंत्रालयीन कर्मचारियों की कमी तथा रिक्त पद भी मामलों के निपटारे को प्रभावित कर रहे हैं।
खंडपीठ ने कहा कि इन समस्याओं पर राज्य सरकार द्वारा भी विचार और आवश्यक कदम उठाए जाने की जरूरत है।
हर मामले के लिए एक समान SOP संभव नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए अंतरिम आवेदनों या स्थगन के संबंध में ऐसा कोई निश्चित नियम या SOP नहीं बनाया जा सकता, जो प्रत्येक मामले में समान रूप से लागू हो। दीवानी मुकदमे में किसी आवेदन पर निर्णय लेने से पहले संबंधित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर देना आवश्यक है।
खंडपीठ ने व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने का कोई आधार नहीं पाते हुए जनहित याचिका खारिज कर दी और मामले का पटाक्षेप कर दिया।
