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नेपाल के 'जलवायु मुआवजे' से पीछे हटने का कूटनीतिक निहितार्थ



जबलपुर | नेपाल में 26 अगस्त 2026 को भोटेकोशी नदी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती जलवायु संवेदनशीलता को पूरी दुनिया के सामने ला दिया है। ग्लेशियर और बर्फ-चट्टान के ढहने से शुरू हुई इस त्रासदी ने नेपाल-चीन सीमा से लेकर त्रिशूली नदी तक भारी तबाही मचाई है। 3 सितंबर तक नेपाल में 1,252 से अधिक लोगों की मौत और 4,200 से अधिक लोगों के लापता होने की खबर थी। करीब 20 हजार घरों के पुनर्निर्माण की जरूरत बताई गई है। आर्थिक नुकसान का सरकारी प्रारंभिक अनुमान लगभग 2.56 अरब डॉलर है, जबकि इससे पहले पुनर्निर्माण और पुनर्वास की संभावित लागत 4 से 5 अरब डॉलर आंकी गई थी। इस त्रासदी के बीच नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के शुरुआती बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल पैदा कर दी थी। बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राजकुमार सिन्हा कहा कि आपदा के बाद मिलने वाली सहायता को केवल ‘दान’ या ‘खैरात’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि जलवायु संकट से सबसे अधिक प्रभावित देशों के प्रति ऐतिहासिक और नैतिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना नेपाल का नया रुख अधिक कूटनीतिक रूप से सुरक नेपाल ने प्रत्यक्ष मुआवजे की मांग से पीछे हटकर शायद यह समझ लिया है कि पड़ोसियों को कटघरे में खड़ा करने से ज्यादा प्रभावी रास्ता वैश्विक जलवायु व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है।

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