जबलपुर | मूलनिवासियों के अधिकारों की रक्षा, उनके संरक्षण और उनके योगदान के सम्मान के लिए समर्पित है। विश्वभर के मूलनिवासियों के मानवाधिकारों की रक्षा करना और उनकी अनूठी सांस्कृतिक पहचान तथा पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान को मान्यता देना है। विश्व आदिवासी दिवस पर बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राजकुमार सिन्हा ने बताया की भारत की कुल आबादी में लगभग 8.6 प्रतिशत आदिवासी हैं, लेकिन विकास परियोजनाओं और वनों के दोहन के कारण हो रहे विस्थापन में उनका अनुपात लगभग 40 प्रतिशत तक है।
विकास परियोजनाओं, खनन, बांध, परमाणु परियोजनाओं, औद्योगिक कॉरिडोर और वन संरक्षण के नाम पर सबसे अधिक विस्थापन का बोझ इन्हीं समुदायों ने उठाया है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासी आज भी जल, जंगल और जमीन पर अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जल, जंगल और जमीन से बेदखल होकर ये समुदाय शहरों और बाहरी इलाकों में सस्ते मजदूर बनने को मजबूर हो जाते हैं। अपने "देवस्थलों", पैतृक जमीनों और समुदाय से दूर होने के बाद वे अपनी पारंपरिक पहचान खोने लगते हैं। विस्थापितों के बच्चे अक्सर शिक्षा से वंचित हो जाते हैं। नई जगहों पर कुपोषण, आधारभूत स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, पोषण और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी गंभीर चुनौती बनी हुई है। कुपोषण, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर, मलेरिया, सिकल सेल एनीमिया तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव आदिवासी समाज के विकास में बड़ी बाधाएं हैं। युवाओं में बेरोज़गारी और पलायन लगातार बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश में विस्थापन की मार झेल रहे आदिवासियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति अत्यंत चिंताजनक और हाशिए पर है। राज्य की कुल आबादी का लगभग 21.1 प्रतिशत आदिवासी है, जो देश में सबसे अधिक है, लेकिन सिंचाई परियोजनाओं (जैसे नर्मदा घाटी परियोजनाएं), खनन और वन्यजीव अभ्यारण्यों के कारण इन्हें बार-बार विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है। जब तक विकास की नीतियों में आदिवासी समुदायों की भागीदारी, सहमति और अधिकारों को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक विश्व आदिवासी दिवस का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।
