जबलपुर। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराना जबलपुर पुलिस के दो तत्कालीन अधिकारियों को महंगा पड़ गया। मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग ने मामले को गंभीर मानते हुए जबलपुर के तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) संजय अग्रवाल और गोरखपुर थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी अरविंद चौबे पर 25-25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। आयोग ने दोनों अधिकारियों को नोटिस जारी कर 7 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश भी दिए हैं।
यह कार्रवाई ग्वारीघाट निवासी अजीत सिंह आनंद द्वारा दायर शिकायत के आधार पर की गई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जून 2023 में उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। रिहा होने के बाद उन्होंने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत गोरखपुर थाने के सीसीटीवी फुटेज और रोजनामचा सान्हा की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने निर्धारित समय सीमा में जानकारी उपलब्ध नहीं कराई।
आरटीआई आवेदन को किया नजरअंदाज
शिकायत के अनुसार, 20 जून 2023 को अजीत सिंह आनंद को उनके घर से पुलिस थाने ले जाया गया, जहां उन्हें 24 घंटे से अधिक समय तक रखा गया। इसके बाद उन्होंने पूरे घटनाक्रम से जुड़े दस्तावेज और सीसीटीवी फुटेज प्राप्त करने के लिए आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किया।
आरोप है कि तत्कालीन थाना प्रभारी ने आवेदन पर कोई कार्रवाई नहीं की। मामला प्रथम अपीलीय अधिकारी के माध्यम से तत्कालीन एएसपी संजय अग्रवाल तक पहुंचा। एएसपी ने रोजनामचा सान्हा उपलब्ध कराने के निर्देश तो दिए, लेकिन अन्य लोगों की निजता का हवाला देते हुए सीसीटीवी फुटेज देने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद शिकायतकर्ता को आदेशानुसार दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए।
आयोग ने माना आरटीआई कानून का उल्लंघन
मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि संबंधित अधिकारियों ने सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का पालन नहीं किया और आवेदक को अनावश्यक रूप से परेशान किया। आयोग ने माना कि समय सीमा के भीतर सूचना उपलब्ध नहीं कराना और आदेशों का पालन न करना स्पष्ट रूप से आरटीआई कानून का उल्लंघन है।
इसी आधार पर आयोग ने दोनों अधिकारियों पर 25-25 हजार रुपये का आर्थिक दंड अधिरोपित किया और उन्हें 7 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।
पुलिस महकमे के लिए सख्त संदेश
आयोग की यह कार्रवाई सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त आवेदनों की अनदेखी करने या जानबूझकर जानकारी रोकने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह फैसला पुलिस महकमे के लिए भी एक बड़ा संदेश है कि आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना प्रत्येक लोक प्राधिकारी की वैधानिक जिम्मेदारी है और इसमें लापरवाही बरतने पर व्यक्तिगत दायित्व तय किया जा सकता है।
