जबलपुर। मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े बहुचर्चित मामले में गुरुवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की विशेष युगलपीठ के समक्ष लगातार सातवें दिन सुनवाई हुई। प्रशासनिक न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष पीठ के समक्ष दोपहर 12 बजे से 1:30 बजे तक ओबीसी आरक्षण के समर्थन में दायर याचिकाओं पर विस्तृत बहस हुई। हालांकि बहस पूरी नहीं हो सकी। न्यायमूर्ति विनय सराफ की आगामी तिथियों में अनुपलब्धता के कारण अब मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे होगी।
सरकार से पूछा—आरक्षण प्रतिशत तय करने का आधार क्या है?
ओबीसी पक्ष की ओर से अदालत में दलील दी गई कि राज्य सरकार आज तक यह स्पष्ट नहीं कर सकी है कि विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण का प्रतिशत किन संवैधानिक, सामाजिक और प्रशासनिक मानकों के आधार पर निर्धारित किया गया। अधिवक्ताओं ने कहा कि आरक्षण व्यवस्था का आधार पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ होना चाहिए तथा सरकार को पर्याप्त प्रतिनिधित्व का मूल्यांकन भी स्पष्ट करना चाहिए।
'केवल ओबीसी आरक्षण का विरोध समानता के सिद्धांत के विपरीत'
एडवोकेट यूनियन फॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस की ओर से अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने न्यायालय को बताया कि प्रदेश में अनुसूचित जाति की लगभग 15.6 प्रतिशत आबादी के लिए 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति की 21.01 प्रतिशत आबादी के लिए 20 प्रतिशत, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित है।
उन्होंने तर्क दिया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की आबादी लगभग 51 प्रतिशत होने के बावजूद लंबे समय तक उसे केवल 14 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। ऐसे में केवल ओबीसी आरक्षण को चुनौती देना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
आरक्षण का निर्धारण केवल जनसंख्या नहीं, संवैधानिक मानकों पर हो
ओबीसी पक्ष ने अदालत से कहा कि आरक्षण केवल जनसंख्या के अनुपात पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके लिए संविधान द्वारा निर्धारित सिद्धांतों, वस्तुनिष्ठ आंकड़ों और पर्याप्त प्रतिनिधित्व के वैज्ञानिक आकलन को आधार बनाया जाना चाहिए। सरकार अब तक यह स्पष्ट नहीं कर सकी है कि उसने विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण प्रतिशत तय करने में कौन-से मानक अपनाए।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) आरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। ओबीसी पक्ष ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत ईडब्ल्यूएस आरक्षण सभी वर्गों के आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों के लिए है, लेकिन मध्य प्रदेश में इसका लाभ व्यवहारिक रूप से केवल सामान्य वर्ग तक सीमित कर दिया गया है।
यह भी तर्क रखा गया कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण को क्षैतिज (Horizontal) के बजाय लंबवत (Vertical) लागू किए जाने से अन्य आरक्षित वर्गों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
28 जुलाई को फिर होगी सुनवाई
ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह, पुष्पेंद्र शाह, परमानंद साहू सहित अन्य अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा। अब मामले में शेष बहस 28 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे विशेष युगलपीठ के समक्ष जारी रहेगी।
प्रमुख बिंदु
सातवें दिन भी 27% ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई जारी रही।
सरकार से आरक्षण प्रतिशत तय करने का आधार स्पष्ट करने की मांग।
ओबीसी की 51% आबादी के बावजूद लंबे समय तक 14% आरक्षण का मुद्दा उठाया गया।
केवल ओबीसी आरक्षण का विरोध समानता के सिद्धांत के विपरीत बताया गया।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण के क्रियान्वयन पर भी गंभीर सवाल उठाए गए।
मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे होगी।
