जबलपुर। ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा जनहित याचिका दायर कर सर्वोच्च न्यायालय कलेजीयम द्वारा मप्र हाईकोर्ट में नये जजो की नियुक्ति हेतु 7 नामो .की अनुशंसा को चुनौती दीं गईं हैं । उक्त याचिका की आधा घंटे से अधिक बहस चली। बहस के दौरान लाईव टेलीकास्ट बंद कर दिया गया तथा वीडियो कंन्फ्रेंसिंग के द्वारा जुड़ने वालो को भी अनुमति नहीं दीं गईं। सुनवाई के मुख्य तर्क रहे कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट मे वर्तमान मे 95% जज सवर्ण जाति के हैं, आजादी से लेकर आज तक एक भी जज एस.टी. वर्ग का नहीं बनाया गया, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गईं 7 नमो की अनुशंसा मे सभी नाम स्वर्ण जाति के हैं जो संविधान की मूल भावना के विपरीत हैं। कोर्ट को बताया गया की सर्वोच्च न्यायालय के 9 जजो मे जिन्होंने ओबीसी आरक्षण के सम्वन्ध मे इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मे फैसला दिया हैं उनमे से 8 जज सवर्ण थे, जिन्होंने उक्त फैसले मे असंवैधानिक रूप से क्रीमिलेंयर का कांसेप्ट रेखंकित किया हैं। इसलिए न्याय पालिका मे एक ही वर्ग तथा विचारधारा के लोगो को न्यायाधीश नियुक्त किए जाने से ओबीसी एस.सी.तथा एस.टी. वर्ग को न्यायापालिका से समुचित न्याय नहीं मिल पा रहा हैं।सुनवाई के दौरान जस्टिस शील नागू द्वारा याचिका क्रमांक wp/8750/2022 मे पारित फैसले का हवाला दिया गया जिसमे उन्होंने ओबीसी की कटाफ अंक 88 तथा सामान्य की 78 अंक को जस्टिफाई किया गया हैं। कालेजियम की अनुशंसा को संविधान की प्रस्तावना तथा अनुच्छेद 14, 15 एवं 16 के विपरीत बताया गया तथा उक्त अनुशंसा को रद्द करने की बात कही गईं तथा हाईकोर्ट मे स्वीकृत पदों मे से 85% पदों पर ओबीसी. एस.सी. तथा एस.टी. वर्ग के जजो को नियुक्त करने की बात कही गईं तथा सुझाव दिया गया की सर्वण जजो के अत्यधिक प्रतिनिधित्व को समाप्त करने हेतु अन्य राज्यों मे ट्रांसफर किए जाए तथा अन्य राज्यों के ओबीसी एस.सी., एसटी जज पदस्थ किए जाए ताकि इस वर्ग के साथ संवैधानिक रूप से न्याय हो सके। न्यायालय ने याचिका की अंतिम सुनवाई कर मामला फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट विनायक प्रसाद शाह, परमानन्द साहू एड., उदय कुमार एड., तीरथ प्रसाद जायसवाल एड., पुष्पेन्द्र कुमार एड., अखलेश कुमार प्रजापति एड., रमेश कुमार प्रजापति एड., त्रिलोकी नाथ सोनकर एड., काजल विश्वकर्मा एड. के द्वारा पैरवी की गईं |
