(श्रीप्रकाश सिंह निमराजे)
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
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डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर को भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री और सामाजिक न्याय के अग्रदूत के रूप में व्यापक रूप से जाना जाता है। किंतु उनके सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत कम चर्चित पक्ष भारत की जल-संसाधन नीति, नदी-घाटी नियोजन, बहुउद्देशीय जल-विकास, तकनीकी संस्थागत ढाँचे और जल तक समान सामाजिक पहुँच से संबंधित है। यह आलेख इसी कम चर्चित पक्ष का ऐतिहासिक एवं समकालीन पुनर्पाठ प्रस्तुत करता है।
लेख का केंद्रीय तर्क यह नहीं है कि डॉ. आंबेडकर आधुनिक अर्थों में जल संरक्षण अभियान चलाने वाले कार्यकर्ता थे। उपलब्ध प्राथमिक और आधिकारिक दस्तावेज इससे अधिक विशिष्ट और महत्वपूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। 1942–46 के दौरान वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में उन्होंने भारत में जल और विद्युत संसाधनों के नियोजित विकास की अखिल भारतीय नीति को आकार देने में भूमिका निभाई। इसी प्रक्रिया में Central Waterways, Irrigation and Navigation Commission (CWINC) का गठन हुआ, जो वर्तमान Central Water Commission की पूर्ववर्ती संस्था थी। उन्होंने नदी-घाटी को एक समेकित इकाई मानकर बहुउद्देशीय विकास, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जलविद्युत, नौवहन और अन्य सार्वजनिक उपयोगों को एक साथ देखने की नीति का समर्थन किया।
उनकी जल-दृष्टि का दूसरा पक्ष सामाजिक न्याय से जुड़ा था। 1927 का महाड सत्याग्रह सार्वजनिक जलस्रोत तक वंचित समुदायों की समान पहुँच के प्रश्न को मानवीय गरिमा और नागरिक अधिकार के प्रश्न में बदल देता है। भारत सरकार के डॉ. आंबेडकर लेख एवं भाषण संग्रह में महाड के चवदार तालाब और सार्वजनिक जलस्रोत के अधिकार का स्पष्ट दस्तावेजी विवरण उपलब्ध है।
21वीं सदी में भारत के सामने भूजल दोहन, जल गुणवत्ता, पेयजल उपलब्धता, सूखा-बाढ़ चक्र, जलवायु परिवर्तन, कृषि की बढ़ती जल-आवश्यकता और जल-वितरण की सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियाँ हैं। इसलिए आंबेडकर की विरासत को बड़े बांधों तक सीमित करने के बजाय वैज्ञानिक जल-नियोजन, नदी-घाटी दृष्टिकोण, संस्थागत सहयोग, स्थानीय जलस्रोतों के पुनर्जीवन और जल-न्याय के संयुक्त ढाँचे में पढ़ना अधिक उपयोगी होगा।
मुख्य शब्द: डॉ. बी. आर. आंबेडकर, जल-संसाधन, जल संरक्षण, जल-न्याय, महाड सत्याग्रह, CWINC, केंद्रीय जल आयोग, नदी-घाटी विकास, बहुउद्देशीय परियोजना, भूजल, जल नीति।
1. प्रस्तावना : संविधान से आगे आंबेडकर को पढ़ने की आवश्यकता
डॉ. आंबेडकर के व्यक्तित्व को भारतीय समाज प्रायः संविधान निर्माण, सामाजिक न्याय, अस्पृश्यता-विरोध और समानता के संघर्ष के संदर्भ में देखता है। यह उनकी भूमिका का केंद्रीय पक्ष है, लेकिन संपूर्ण पक्ष नहीं। भारत सरकार के आधिकारिक डॉ. आंबेडकर लेख एवं भाषण पोर्टल में उन्हें अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद्, पत्रकार, नीति-निर्माता, प्रशासक और विधिवेत्ता के रूप में भी रेखांकित किया गया है।
जल-संसाधनों के क्षेत्र में उनका योगदान इसी बहुआयामी व्यक्तित्व को समझने की एक महत्वपूर्ण खिड़की है। केंद्रीय जल आयोग द्वारा प्रकाशित शोधग्रंथ Ambedkar's Contribution to Water Resources Development में 1942–46 के उनके कार्यकाल को भारत की जल एवं विद्युत नीति के विकास, केंद्रीय तकनीकी संस्थाओं के निर्माण और बहुउद्देशीय नदी-घाटी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण बताया गया है। इस ग्रंथ की शोध-परियोजना में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. सुखदेव थोराट सहित शोधकर्ताओं ने अभिलेखीय सामग्री का अध्ययन किया था।
इसलिए आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि “आंबेडकर ने जल के लिए क्या किया?”, बल्कि अधिक वैज्ञानिक प्रश्न यह है कि उन्होंने जल को किस प्रकार की सार्वजनिक नीति और विकास-दृष्टि से देखा और वह दृष्टि आज के जल संकट में किस सीमा तक प्रासंगिक है?
2. जल संरक्षण, जल-संसाधन विकास और जल-न्याय : तीन अलग लेकिन जुड़े हुए आयाम
“जल संरक्षण” और “जल-संसाधन विकास” को एक ही अर्थ में प्रयोग करना ऐतिहासिक दृष्टि से सही नहीं होगा। जल संरक्षण में वर्षाजल संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन, भूजल पुनर्भरण, जल की बचत, जलागम विकास और स्थानीय जलस्रोतों का संरक्षण शामिल हो सकता है। दूसरी ओर जल-संसाधन विकास में नदी-घाटी नियोजन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, जलविद्युत, नौवहन, पेयजल और बड़े जल-ढाँचे का नियोजन आता है।
डॉ. आंबेडकर की प्रमाणित ऐतिहासिक भूमिका मुख्यतः दूसरे क्षेत्र—राष्ट्रीय जल-संसाधन नीति और संस्थागत जल प्रबंधन—में दिखाई देती है। लेकिन महाड सत्याग्रह उनके चिंतन का तीसरा आयाम सामने लाता है—जल-न्याय।
इसलिए आंबेडकर की जल-दृष्टि को तीन वृत्तों में समझा जा सकता है—
जल तक समान सामाजिक पहुँच → जल-संसाधनों का वैज्ञानिक नियोजन → जल का न्यायपूर्ण और बहुउद्देशीय सार्वजनिक उपयोग।
यही त्रिकोण 21वीं सदी में उनके विचारों को पुनः पढ़ने का आधार बन सकता है।
3. महाड सत्याग्रह : पानी के एक घूंट से नागरिक अधिकार तक
1927 का महाड सत्याग्रह जल और सामाजिक न्याय के संबंध को समझने के लिए केंद्रीय घटना है। डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन, भारत सरकार के आधिकारिक विवरण में कहा गया है कि वंचित वर्गों को सार्वजनिक कुओं और तालाबों से पानी लेने की अनुमति नहीं थी और 1927 में डॉ. आंबेडकर ने चौदार तालाब पर महाड मार्च का नेतृत्व किया।
डॉ. आंबेडकर के अपने भाषण के सरकारी संकलन में महाड के सार्वजनिक चवदार तालाब से पानी लेने के अधिकार का प्रश्न स्पष्ट रूप से दर्ज है। उनके अनुसार यदि तथाकथित अस्पृश्य समुदाय के लोगों के तालाब इस्तेमाल करने के अधिकार को स्वीकार किया जाता तो सत्याग्रह की आवश्यकता ही नहीं होती। यह संघर्ष केवल पानी पीने की सुविधा का संघर्ष नहीं था; यह सार्वजनिक संसाधन पर समान नागरिक अधिकार की घोषणा था।
समकालीन शोध भी महाड को “water justice” के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में पढ़ता है। 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन ने महाड सत्याग्रह को जाति-आधारित जल-वंचना के विरुद्ध मानवाधिकार और समानता के संघर्ष के रूप में विश्लेषित किया।
इससे एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है—जल की उपलब्धता और जल पर समान अधिकार दो अलग प्रश्न हैं।
4. 1942–46 : राष्ट्रीय जल नीति की दिशा में परिवर्तन
डॉ. आंबेडकर का जल-संसाधन संबंधी दूसरा बड़ा योगदान उनके 1942–46 के प्रशासनिक कार्यकाल से जुड़ा है। केंद्रीय जल आयोग के शोधग्रंथ के अनुसार इसी अवधि में भारत के जल एवं विद्युत संसाधनों के नियोजित विकास के लिए व्यापक अखिल भारतीय नीति विकसित की गई।
डॉ. आंबेडकर की अपनी Utilisation of Water Resources सामग्री में यह विचार स्पष्ट रूप से मिलता है कि भारत के जल संसाधनों का उपयोग “सबके अधिकतम लाभ” के लिए किया जाना चाहिए। इसमें अमेरिकी Tennessee Valley Scheme का अध्ययन, केंद्रीय तकनीकी संस्थाओं की स्थापना तथा ऐसी परियोजनाओं की कल्पना शामिल थी जो केवल सिंचाई तक सीमित न रहें।
यहाँ “सबके लाभ” की अवधारणा को आज के संदर्भ में जल-न्याय के साथ जोड़कर पढ़ा जा सकता है, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि यह आधुनिक पर्यावरणीय न्याय की भाषा में आंबेडकर का प्रत्यक्ष कथन नहीं था। यह आज के शोधकर्ता द्वारा किया गया व्याख्यात्मक संबंध है।
5. CWINC : जल प्रशासन का राष्ट्रीय तकनीकी ढाँचा
इस काल की सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत उपलब्धियों में Central Waterways, Irrigation and Navigation Commission—CWINC—का गठन था। केंद्रीय जल आयोग के अभिलेख के अनुसार CWINC स्थापित करने संबंधी प्रस्ताव को डॉ. आंबेडकर ने मार्च 1944 में अनुमोदित किया और वायसराय ने 4 अप्रैल 1945 को स्वीकृति दी। सरकारी प्रस्ताव में आयोग को केंद्रीय स्तर की fact-finding, planning और coordinating संस्था के रूप में परिकल्पित किया गया था।
इसके कार्यों में जलमार्ग, सिंचाई और जल-संसाधन संबंधी जानकारी एकत्र करना, समन्वय करना, अध्ययन करना और केंद्र तथा प्रांतों को तकनीकी सलाह देना शामिल था। बाद के संस्थागत ढाँचे में जल, वर्षा, runoff, groundwater resources, reservoir siltation और hydraulic structures जैसे विषयों से संबंधित डेटा-संग्रह को भी केंद्रीय तकनीकी व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया।
इसमें आज के जल प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश है—जल नीति अनुमान पर नहीं, बल्कि डेटा, विशेषज्ञता, निगरानी और संस्थागत समन्वय पर आधारित होनी चाहिए।
6. नदी को केवल नदी नहीं, नदी-घाटी मानने की दृष्टि
डॉ. आंबेडकर की जल नीति का महत्वपूर्ण तत्व था कि नदी को केवल एक जलधारा के रूप में नहीं बल्कि पूरे नदी-घाटी क्षेत्र के विकास की इकाई के रूप में देखा जाए।
केंद्रीय जल आयोग के शोधग्रंथ में 1945–47 के दौरान दामोदर और महानदी घाटियों के लिए basin-wise multipurpose development plans का उल्लेख मिलता है। इस दृष्टिकोण में बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जलविद्युत, नौवहन और जलापूर्ति को एक साथ देखा गया।
सोन नदी परियोजना के संबंध में 1945 की अंतर-प्रांतीय बैठक में “regional and multipurpose development” तथा अंतरराज्यीय नदियों के लिए River Valley Authority की अवधारणा को अधिक स्पष्ट रूप दिया गया। सोन नदी के संदर्भ में अनेक प्रांतों और रियासतों को जोड़ने वाली विकास-दृष्टि यह दिखाती है कि नदी-घाटी नियोजन को प्रशासनिक सीमाओं से आगे जाकर देखने का प्रयास किया जा रहा था।
आज जिस Integrated River Basin Management की चर्चा होती है, उससे इस ऐतिहासिक दृष्टिकोण की तुलना की जा सकती है। केंद्रीय जल आयोग की वर्तमान भूमिका में भी नदी-घाटी तथा बहुउद्देशीय परियोजनाओं के तकनीकी-आर्थिक मूल्यांकन का व्यापक ढाँचा मौजूद है।
7. दामोदर घाटी : बाढ़ से विकास की ओर
दामोदर नदी का इतिहास इस नीति-दृष्टि को समझने का विशेष उदाहरण है। केंद्रीय जल आयोग के अभिलेख बताते हैं कि दामोदर को लेकर बाढ़ नियंत्रण की समस्या के साथ जल-संरक्षण, सिंचाई और अन्य उपयोगों को जोड़ने की आवश्यकता सामने आई। 1945 की बैठकों में दामोदर के बहुउद्देशीय विकास की दिशा में समन्वित योजना पर चर्चा हुई।
अभिलेखों के अनुसार डॉ. आंबेडकर ने दामोदर घाटी विकास को Tennessee Valley Authority के अनुभव से जोड़कर देखने का समर्थन किया और प्रारंभिक कार्य तथा अंतर-प्रांतीय विमर्श में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। केंद्रीय जल आयोग के शोधग्रंथ में यह भी दर्ज है कि उनके विभाग के कार्य ने बाद में बने दामोदर घाटी विकास के लिए आधार तैयार किया।
लेकिन यहाँ इतिहास के प्रति सावधानी आवश्यक है। दामोदर घाटी परियोजना अनेक इंजीनियरों, प्रशासकों, प्रांतीय सरकारों और बाद की स्वतंत्र भारत सरकार की संयुक्त प्रक्रिया का परिणाम थी। इसलिए इसे केवल “आंबेडकर की परियोजना” कहना उचित नहीं होगा। अधिक सटीक कथन है कि आंबेडकर ने उसके प्रारंभिक संस्थागत और नीतिगत आधार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
8. हिराकुंड : दृष्टि, योजना और बाद का निर्माण
महानदी घाटी में हिराकुंड परियोजना भी आंबेडकर की जल-संसाधन नीति के अध्ययन में महत्वपूर्ण है। केंद्रीय जल आयोग के दस्तावेज में महानदी घाटी विकास और हिराकुंड परियोजना के संबंध में 1940 के दशक के प्रशासनिक और तकनीकी प्रयासों का विस्तृत विवरण है। हिराकुंड अंततः 1957 में पूरा हुआ।
इसलिए यह कहना कि “हिराकुंड बांध आंबेडकर ने बनवाया” ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक सरलीकरण होगा। सही निष्कर्ष यह है कि हिराकुंड सहित कुछ बहुउद्देशीय नदी-घाटी परियोजनाओं की नीति और प्रारंभिक योजना-प्रक्रिया उस जल-विकास दृष्टि से जुड़ी थी जिसे आंबेडकर के कार्यकाल में आगे बढ़ाया गया।
9. जल और संविधान : अंतरराज्यीय नदी का प्रश्न
जल की सबसे जटिल समस्याओं में से एक तब पैदा होती है जब नदी एक से अधिक राज्यों से होकर गुजरती है। डॉ. आंबेडकर के संवैधानिक कार्य का जल-संबंधी महत्व इसी स्तर पर सामने आता है।
केंद्रीय जल आयोग के शोधग्रंथ में संविधान की Entry 56 और Article 262 को अंतरराज्यीय नदियों तथा नदी-घाटियों से जुड़े प्रश्नों के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया गया है। बाद में River Boards Act, 1956 और Inter-State Water Disputes Act, 1956 जैसी व्यवस्थाएँ इसी व्यापक संवैधानिक ढाँचे के अंतर्गत विकसित हुईं।
P. Abraham के 2002 के Economic and Political Weekly लेख ने भी आंबेडकर की जल-नीति को अंतरराज्यीय नदी विवादों के संदर्भ में पुनः देखने की आवश्यकता पर बल दिया था। उनके अध्ययन का विशेष संदर्भ कावेरी विवाद था।
इससे यह स्पष्ट होता है कि आंबेडकर के लिए जल प्रश्न केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं था; वह संघीय व्यवस्था, प्रशासन, कानून और संसाधन-वितरण से भी जुड़ा था।
10. आंबेडकर के जल चिंतन पर उपलब्ध प्रमुख शोध
आंबेडकर के जल-संसाधन संबंधी योगदान पर शोध का एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रो. सुखदेव थोराट की पुस्तक Ambedkar's Role in Economic Planning and Water Policy है। 1998 में प्रकाशित इस पुस्तक में जल नीति की उत्पत्ति, तकनीकी संस्थाओं का निर्माण, दामोदर घाटी, हिराकुंड, सोन परियोजना, बिजली नीति, संविधान और जल नीति जैसे अध्याय शामिल हैं।
2002 में P. Abraham ने Economic and Political Weekly में “Notes on Ambedkar's Water Resources Policies” प्रकाशित किया, जिसमें यह तर्क सामने आया कि संविधान निर्माण से बाहर जल-संसाधन नियोजन और सिंचाई-ऊर्जा विकास में आंबेडकर का योगदान लंबे समय तक पर्याप्त रूप से स्वीकार नहीं किया गया।
2020 के एक शोध-पत्र Dr. Babasaheb Ambedkar and Water Resource Management ने भी दामोदर, हिराकुंड, सोन और कोसी जैसे नदी-घाटी विकास प्रयासों को आंबेडकर की जल-संसाधन नीति के संदर्भ में अध्ययन किया। हालांकि इस प्रकार के बाद के शोधों में परियोजनाओं के श्रेय संबंधी दावों को प्राथमिक अभिलेखों से मिलाकर पढ़ना आवश्यक है।
2024 के शोध Water Justice and Caste Exclusion: Understanding Mahad Satyagraha and its Contemporary Implications ने जल को सामाजिक अधिकार और जाति-आधारित बहिष्कार के संदर्भ में देखा।
2025 में Social Justice Sandesh में प्रकाशित “Dr. B.R. Ambedkar and Water Justice: Conservation, Access, and the Path to Equality” ने महाड, संवैधानिक संदर्भ और जल-संसाधन नीति को एक साथ पढ़ने का प्रयास किया। यह अध्ययन जल को केवल भौतिक संसाधन नहीं बल्कि समानता, न्याय और गरिमा से जोड़ता है।
इसी क्रम में 2025 के Water Resources Research में प्रकाशित एक ऐतिहासिक-दार्शनिक अध्ययन ने आंबेडकर के जल-संबंधी कार्य को व्यक्ति और समुदाय के जल-अधिकार से लेकर अंतरराज्यीय नदी-विकास और राष्ट्रीय जल-विज्ञान तक विभिन्न स्तरों पर देखने का प्रयास किया।
इस साहित्य से एक बात स्पष्ट होती है कि आंबेडकर के जल-संबंधी योगदान पर अब अलग-अलग विषयों—जल नीति, आर्थिक नियोजन, जल-न्याय, जाति, नदी-घाटी विकास और पर्यावरणीय न्याय—से शोध हो रहा है।
11. 21वीं सदी में समस्या का नया स्वरूप
आज भारत का जल प्रश्न 1940 के दशक से अलग है, लेकिन उसका एक मूल तत्व वही है—सीमित जल संसाधनों का वैज्ञानिक और न्यायपूर्ण उपयोग।
Central Ground Water Board की 2024 राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार भारत में वार्षिक भूजल निकासी 245.64 BCM आंकी गई और कुल भूजल निकासी का लगभग 87 प्रतिशत कृषि क्षेत्र से जुड़ा था। देश का औसत groundwater extraction stage 60.47 प्रतिशत था; 6,746 assessment units में 751 को over-exploited और 206 को critical श्रेणी में रखा गया।
इसका अर्थ यह है कि 21वीं सदी में जल संरक्षण का प्रश्न केवल तालाब बचाने का प्रश्न नहीं है। इसमें भूजल, कृषि, ऊर्जा, शहरीकरण, पेयजल, जल गुणवत्ता और स्थानीय जलस्रोतों की स्थिरता को साथ देखना होगा।
12. पेयजल और जल-न्याय
Jal Jeevan Mission ने ग्रामीण परिवारों तक सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल पहुँचाने को राष्ट्रीय नीति का प्रमुख लक्ष्य बनाया है। मिशन के दस्तावेजों में जल संरक्षण, sustainable use, स्रोत की स्थिरता, सामुदायिक भागीदारी और महिलाओं की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण घटक माना गया है।
यहाँ महाड की ऐतिहासिक घटना और वर्तमान पेयजल नीति के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक संबंध दिखाई देता है—जलस्रोत होना पर्याप्त नहीं; व्यक्ति तक सुरक्षित और सम्मानजनक पहुँच होना भी आवश्यक है।
लेकिन आधुनिक नीति में केवल सामाजिक पहुँच पर्याप्त नहीं है। जल स्रोत टिकाऊ भी होना चाहिए। इसलिए 21वीं सदी का जल-न्याय तीन प्रश्न पूछता है—
पानी उपलब्ध है या नहीं?
सभी सामाजिक समूहों को समान और सुरक्षित पहुँच है या नहीं?
जिस स्रोत से पानी लिया जा रहा है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए टिकाऊ है या नहीं?
13. GKSSS और ग्वालियर : शोध से जमीनी जल कार्य तक
इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पक्ष ग्वालियर स्थित गोपाल किरन समाजसेवी संस्था का स्वयं का जल-संबंधी अनुभव है। यह उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे “जल संरक्षण” और “जल-संसाधन नीति” के बीच जमीन पर संबंध दिखाई देता है।
भारत सरकार की योजना पत्रिका के जून 2005 अंक में “Where There Is a Will, There Is a Way” शीर्षक से रामनगर, ग्वालियर की एक जल-पुनर्जीवन सफलता-कथा प्रकाशित हुई। लेख में श्रीप्रकाश सिंह निमराजे का नाम तथा गोपाल किरन संस्था का उल्लेख है। रामनगर में वेसली नदी के किनारे स्थित गांव में सूखे और पलायन की स्थिति के बीच तालाबों की स्थिति खराब थी। स्थानीय समुदाय ने वर्षाजल संचयन, कृषि सुधार और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से प्रयास शुरू किए। गोपाल किरन संस्था ने महिलाओं के साथ मिलकर तालाब पुनर्निर्माण में सहयोग किया।
उसी प्रकाशित विवरण के अनुसार बाबूलवाला तालाब, जो बंटीवाला तालाब से जुड़ा था, के पुनर्जीवन में ग्रामीण परिवारों से धन-संग्रह और महिलाओं के श्रमदान की भूमिका रही। 1,092 मीटर लंबे तालाब के पुनर्जीवन के बाद 50 परिवारों को लगभग 192.11 बीघा कृषि भूमि में सिंचाई का लाभ मिलने का उल्लेख किया गया है। तालाब के किनारे आंवला, नीम और शीशम जैसे पौधों का भी विकास हुआ।
यह उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें जल संरक्षण केवल इंजीनियरिंग का काम नहीं रहा। स्थानीय महिला समूह, सामुदायिक योगदान, कृषि, आजीविका और जलस्रोत पुनर्जीवन—सभी एक साथ जुड़े।
14. जल और लैंगिक दृष्टिकोण : GKSSS की एक अन्य पहल
GKSSS के जल संबंधी कार्य का एक दूसरा दस्तावेजी प्रमाण Indian Social Institute की 2020–21 वार्षिक रिपोर्ट में मिलता है। रिपोर्ट के अनुसार 21 मार्च 2021 को International Water Day के अवसर पर GKSSS, Gwalior द्वारा आयोजित कार्यक्रम में “Gender Perspectives in Water Resource Management” विषय पर व्याख्यान/प्रस्तुति आयोजित की गई थी।
यह विषय 21वीं सदी के जल विमर्श के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पानी की कमी का बोझ समान रूप से वितरित नहीं होता। घरेलू पानी की व्यवस्था, संग्रहण, दूरी, समय और परिवार की देखभाल जैसे कार्यों में महिलाओं की भूमिका अधिक हो सकती है। इसलिए जल नीति को केवल पाइप, बांध और नहरों की नीति मानना पर्याप्त नहीं है; उसमें समय, श्रम, स्वास्थ्य, सुरक्षा और निर्णय-निर्माण को भी शामिल करना होगा।
15. ग्वालियर में शोध-जिज्ञासा से राष्ट्रीय संवाद तक
डॉ. आंबेडकर और जल-संसाधनों के संबंध में मेरा ध्यान किसी पूर्वनिर्धारित अकादमिक परियोजना से नहीं, बल्कि ग्वालियर में हुई एक बातचीत से गया। सतही जल संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी से बातचीत के दौरान डॉ. आंबेडकर की जल-संसाधन संबंधी भूमिका का उल्लेख हुआ।
सामान्य रूप से डॉ. आंबेडकर की पहचान संविधान निर्माण, सामाजिक समानता और वंचित समुदायों के अधिकारों के संघर्ष से की जाती है। इसलिए जब यह बात सामने आई कि उन्होंने भारत की जल नीति और जल-संसाधन विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, तो यह मेरे लिए एक शोध-प्रश्न बन गया।
मैंने कही-सुनी बात को सीधे स्वीकार करने के बजाय यह जानने का प्रयास किया कि इस दावे के पीछे मूल दस्तावेज क्या हैं?
इसी प्रश्न ने मुझे डॉ. आंबेडकर के लेखन, Writings and Speeches, केंद्रीय जल आयोग के अभिलेख, जल नीति पर उपलब्ध पुस्तकों और शोध-पत्रों की ओर ले गया। इस खोज में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज Ambedkar's Contribution to Water Resources Development सामने आया, जिसकी मूल शोध-परियोजना केंद्रीय जल आयोग ने 1991–93 के दौरान अभिलेखीय सामग्री के आधार पर कराई थी और जिसके शोध कार्य में प्रो. सुखदेव थोराट की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
इसी शोध-जिज्ञासा को आगे बढ़ाते हुए ग्वालियर के होमगार्ड परिसर में डॉ. आंबेडकर और जल-संसाधन संबंधी विषय पर राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी आयोजित करने का प्रयास किया गया, जिसमें विद्वानों के साथ इस कम चर्चित पक्ष पर विचार-विमर्श किया गया। उपलब्ध डिजिटल समाचार अभिलेखों में इस विशिष्ट संगोष्ठी की स्वतंत्र समाचार-कटिंग मुझे नहीं मिली है; इसलिए इसके प्रतिभागियों या वक्ताओं के संबंध में बिना दस्तावेज के कोई अतिरिक्त दावा करना उचित नहीं होगा। लेकिन इस आयोजन का महत्व शोध-प्रक्रिया की दृष्टि से था—एक स्थानीय बातचीत को प्रश्न बनाया गया, प्रश्न को दस्तावेजों से जाँचा गया और फिर उसे सार्वजनिक अकादमिक संवाद का विषय बनाया गया।
इस पूरी यात्रा ने एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की—किसी महान व्यक्तित्व के बारे में लोकप्रिय धारणा जितनी महत्वपूर्ण है, उससे अधिक महत्वपूर्ण उसके मूल दस्तावेजों को पढ़ना है।
16. इस शोध में किन दावों को स्वीकार नहीं किया गया
डॉ. आंबेडकर के जल-संबंधी योगदान पर लोकप्रिय साहित्य में अनेक कथाएँ और दावे मिलते हैं। शोध की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है कि दस्तावेजी प्रमाण और लोकप्रचलित कथा में अंतर रखा जाए।
इसी कारण ऐसे प्रसंगों को इस आलेख में शामिल नहीं किया गया है जिनके लिए विश्वसनीय प्राथमिक या संस्थागत प्रमाण उपलब्ध नहीं मिले—जैसे किसी ऐतिहासिक भवन में जाकर डॉ. आंबेडकर द्वारा व्यक्तिगत रूप से जल-व्यवस्था ठीक करने जैसी कथाएँ।
इसी तरह दामोदर या हिराकुंड जैसी परियोजनाओं को “केवल आंबेडकर की व्यक्तिगत उपलब्धि” कहना भी उचित नहीं है। केंद्रीय जल आयोग के मूल शोध में अनेक विशेषज्ञों, इंजीनियरों और अधिकारियों की भूमिका स्वीकार की गई है। स्वयं प्रो. थोराट ने अपने शोधग्रंथ की भूमिका में H.C. Prior, D.L. Mazumdar, A.N. Khosla, H.M. Mathews और Tennessee Valley Authority से जुड़े W.L. Voorduin सहित तकनीकी विशेषज्ञों के योगदान को दर्ज किया है।
इसलिए इस लेख का निष्कर्ष किसी व्यक्ति-केंद्रित महिमामंडन के बजाय दस्तावेजी योगदान की पहचान पर आधारित है।
17. 21वीं सदी के लिए आंबेडकर की जल-दृष्टि से क्या सीखा जा सकता है?
आंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका को आज के संदर्भ में पढ़ते समय सीधे पुराने मॉडल की नकल करने के बजाय उसके मूल सिद्धांतों को समझना अधिक उपयोगी होगा।
पहला—जल नीति वैज्ञानिक हो
जल की उपलब्धता, भूजल स्तर, वर्षा, नदी प्रवाह, जल गुणवत्ता और उपयोग के विश्वसनीय आँकड़े नीति की बुनियाद होने चाहिए। CWINC की मूल अवधारणा में तथ्य-संग्रह और तकनीकी सलाह का जो महत्व था, आज वह और अधिक आवश्यक हो गया है।
दूसरा—नदी-घाटी को समग्र इकाई माना जाए
किसी नदी का विकास केवल एक बांध या नहर से निर्धारित नहीं हो सकता। नदी की पूरी घाटी, उसके भूजल, कृषि, बाढ़, पारिस्थितिकी और मानव बस्तियों को एक साथ देखना आवश्यक है।
तीसरा—जल संरक्षण और जल विकास को जोड़ा जाए
बड़े जल ढाँचे और छोटे स्थानीय जलस्रोत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। तालाब, कुएँ, जलागम, वर्षाजल संचयन और भूजल पुनर्भरण को नदी-घाटी की बड़ी योजना से जोड़ा जाना चाहिए।
चौथा—जल-न्याय को नीति का केंद्र बनाया जाए
महाड का संदेश आज भी प्रासंगिक है—जल पर अधिकार सामाजिक गरिमा का प्रश्न हो सकता है। इसलिए जाति, वर्ग, लिंग, भौगोलिक स्थिति और आर्थिक क्षमता के आधार पर जल-वंचना को विकास की समस्या माना जाना चाहिए।
पाँचवाँ—महिलाओं की भूमिका को केंद्रीय बनाया जाए
जल प्रबंधन में महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि योजना, निर्णय, निगरानी और स्थानीय प्रबंधन की सक्रिय भागीदार बनाया जाना चाहिए। आधुनिक जल नीति में भी सामुदायिक और महिला भागीदारी पर जोर दिया जा रहा है।
छठा—अंतरराज्यीय सहयोग को मजबूत किया जाए
नदी राज्य की सीमा पर समाप्त नहीं होती। इसलिए डेटा साझा करना, संयुक्त योजना, कानूनी संस्थाएँ और सहकारी संघवाद जल विवादों के समाधान के लिए आवश्यक हैं।
सातवाँ—भूजल को अदृश्य संसाधन मानकर उपेक्षित न किया जाए
आज की जल नीति में groundwater recharge, extraction regulation और स्थानीय जलस्रोतों की स्थिरता को प्राथमिकता देनी होगी। 2024 के भूजल आकलन के आँकड़े इस चुनौती की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं।
18. आंबेडकर की जल-दृष्टि और GKSSS के अनुभव का संवाद
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर बनाए रखना जरूरी है। डॉ. आंबेडकर की भूमिका ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रीय जल नीति, संस्थागत जल नियोजन और सामाजिक जल-अधिकार के स्तर पर प्रमाणित होती है। दूसरी ओर GKSSS के ग्वालियर अनुभव में तालाब पुनर्जीवन, सामुदायिक श्रमदान, महिलाओं की भागीदारी और जल-जागरूकता जैसे स्थानीय स्तर के कार्य दिखाई देते हैं।
इन दोनों को एक ही कार्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन इनके बीच एक वैचारिक संवाद अवश्य बनाया जा सकता है—
आंबेडकर का प्रश्न था—सार्वजनिक संसाधनों पर समान अधिकार और उनका व्यापक उपयोग कैसे सुनिश्चित हो?
स्थानीय जल संरक्षण का प्रश्न है—उस संसाधन को टिकाऊ कैसे बनाया जाए और समुदाय को उसके प्रबंधन में कैसे जोड़ा जाए?
21वीं सदी की जल नीति को इन दोनों प्रश्नों का उत्तर एक साथ देना होगा।
19. एक नया जल-न्याय मॉडल
इस अध्ययन के आधार पर भारत में जल नीति के लिए एक छह-स्तरीय मॉडल प्रस्तावित किया जा सकता है—
स्रोत संरक्षण → वैज्ञानिक मापन → नदी-घाटी नियोजन → समान पहुँच → सामुदायिक भागीदारी → पीढ़ीगत स्थिरता।
पहले चरण में तालाब, झील, कुएँ, नदियाँ और जलागम संरक्षित हों। दूसरे चरण में वर्षा, भूजल और जल उपयोग का वैज्ञानिक डेटा तैयार हो। तीसरे चरण में नदी को प्रशासनिक सीमा के बजाय नदी-घाटी की दृष्टि से देखा जाए। चौथे चरण में सामाजिक रूप से समान जल पहुँच सुनिश्चित हो। पाँचवें चरण में ग्रामसभा, स्थानीय संस्थाएँ, महिलाएँ और जल-उपयोगकर्ता निर्णय प्रक्रिया में शामिल हों। छठे चरण में यह सुनिश्चित किया जाए कि आज का जल उपयोग भविष्य की पीढ़ियों के संसाधन को समाप्त न करे।
यही वह स्थान है जहाँ ऐतिहासिक आंबेडकर और समकालीन जल संरक्षण के बीच सार्थक संवाद स्थापित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
डॉ. बी. आर. आंबेडकर को जल संरक्षण के आधुनिक अर्थ में एक पारंपरिक “जल कार्यकर्ता” कहना उपलब्ध इतिहास को सरल बना देगा। इसके विपरीत उपलब्ध प्राथमिक स्रोतों, केंद्रीय जल आयोग के अभिलेखों और स्वतंत्र शोध से एक अधिक ठोस तस्वीर सामने आती है।
1927 में महाड के माध्यम से उन्होंने सार्वजनिक जलस्रोत तक समान पहुँच को सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के प्रश्न से जोड़ा। 1942–46 में उन्होंने जल एवं विद्युत संसाधनों के अखिल भारतीय नियोजन, तकनीकी संस्थागत ढाँचे और नदी-घाटी के बहुउद्देशीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिका निभाई। CWINC की स्थापना, दामोदर और महानदी सहित नदी-घाटी परियोजनाओं की प्रारंभिक नीति, River Valley Authority की अवधारणा तथा अंतरराज्यीय जल संबंधी संवैधानिक व्यवस्था इसी व्यापक प्रक्रिया के हिस्से थे।
उनका महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने कुछ परियोजनाओं के लिए नीति का समर्थन किया। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने जल को विकास, तकनीक, प्रशासन, संघीय व्यवस्था और सामाजिक न्याय से जोड़कर देखने की दिशा में योगदान दिया।
21वीं सदी में जब भारत भूजल दोहन, जलवायु परिवर्तन, असमान जल उपलब्धता, पेयजल सुरक्षा, कृषि की जल आवश्यकता और जल गुणवत्ता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब आंबेडकर की जल-दृष्टि का पुनर्पाठ उपयोगी हो सकता है। लेकिन यह पुनर्पाठ तभी सार्थक होगा जब बड़े जल संसाधन ढाँचे के साथ तालाब, वर्षाजल संचयन, भूजल पुनर्भरण, स्थानीय जलागम, सामुदायिक भागीदारी और जल-न्याय को भी समान महत्व दिया जाए।
ग्वालियर में एक बातचीत से शुरू हुई यह शोध-जिज्ञासा अंततः उपलब्ध सरकारी अभिलेखों, डॉ. आंबेडकर के अपने लेखन, केंद्रीय जल आयोग के शोध, अकादमिक अध्ययनों और गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के जमीनी अनुभवों तक पहुँची। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि इतिहास की प्रतिष्ठा केवल स्मरण से नहीं, प्रमाण की खोज से बनती है।
और जल के संदर्भ में डॉ. आंबेडकर की विरासत का सबसे सार्थक पुनर्पाठ शायद यही है—
जल का संरक्षण केवल पानी बचाना नहीं है; जल तक न्यायपूर्ण पहुँच, वैज्ञानिक प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार की रक्षा करना भी जल संरक्षण ही है।
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